
दरअसल, रिंगबांध तालाब का कुल रकबा 6.25 एकड़ है। सरकारी रिकॉर्ड में यह जमीन निस्तार मद में दर्ज है। आरोप है कि तालाब के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया गया है। इसी में से 57 डिसमिल जमीन की जनवरी 2026 में आजाद इराकी के नाम रजिस्ट्री कराई गई थी। जांच में सामने आया कि सेटलमेंट रिकॉर्ड में यह जमीन अनुसूचित जनजाति वर्ग की है।
जानिए पूरा मामला
जानकारी के मुताबिक, करीब पांच महीने पहले भूमाफियाओं ने रिंगबांध तालाब के जलक्षेत्र में मिट्टी डालकर उसे पाटना शुरू किया था। इसका पता चलने पर कांग्रेस और भाजपा के पार्षदों ने विरोध किया।इसके बाद अंबिकापुर तहसीलदार ने तुरंत जमीन पाटने पर रोक लगा दी। नगर निगम आयुक्त और तहसीलदार ने भी जमीन पर किसी तरह का काम करने पर रोक लगा दी थी। मामले को गंभीरता से लेते हुए सरगुजा कलेक्टर ने इसकी जांच अंबिकापुर एसडीएम से कराई।
फर्जी मृत्यु प्रमाणत्र से रजिस्ट्री के लगे थे आरोप
समाजसेवी कैलाश मिश्रा ने आरोप लगाया है कि जमीन के असली मालिक की मौत के बाद उसके दो अलग-अलग मृत्यु प्रमाणपत्र बनाए गए। इसके बाद जमीन के वारिस के नाम दर्ज कराने के लिए आवेदन किया गया। दोनों दस्तावेजों में अलग-अलग लोगों को वारिस बताया गया है। फिलहाल यह मामला तहसील न्यायालय में चल रहा है।
वहीं, आलोक दुबे ने भी सरगुजा कलेक्टर से शिकायत कर मामले की जांच की मांग की थी। पार्षद आलोक दुबे के मुताबिक, रिंगबांध तालाब नगर निगम के 17 तालाबों की सूची में पांचवें नंबर पर दर्ज है। उन्होंने बताया कि तालाब की जमीन काफी कीमती है।
जमीन की फर्जी तरीके से तैयार किया गया दस्तावेज
कलेक्टर की जांच में सामने आया कि प्रतीक्षा बस स्टैंड, अंबिकापुर के पास खसरा नंबर 3714 की जमीन के जल क्षेत्र को मिट्टी डालकर पाटा जा रहा था और वहां प्लाटिंग की जा रही थी।
जांच में आरोप है कि जमीन के असली मालिक जैलाल पिता बोधन गोंड़ के नाम में हेरफेर कर सिर्फ ‘जैलाल पिता बोधन’ के नाम से फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र तैयार किया गया। इसके बाद विक्रेता चंद्रशेखर यादव ने यह जमीन जयनगर के आजाद इराकी के नाम रजिस्ट्री कर दी।
जांच रिपोर्ट के मुताबिक, यह जमीन 1954-55 से पहले से ही जैलाल पिता बोधन, जाति गोंड़ के नाम पर दर्ज थी। रिपोर्ट में जमीन के हस्तांतरण में फर्जी और गलत दस्तावेजों के इस्तेमाल के साथ वारिसों से जुड़े रिकॉर्ड में भी गड़बड़ी का उल्लेख किया गया है।