
पौराणिक किंवदंती और गहरी धार्मिक आस्था
भाठीगढ पहाड़ी के इस स्थान से जुड़ी लोक-मान्यताएं और किंवदंतियां इसे और भी खास बनाती हैं। किंवदंती के अनुसार माता पार्वती इस पहाड़ी के ऊपर से गुजर रही थीं, और उस समय उनके पैर की पायल जहां पर टूटकर गिरी, वहीं से पैरी नदी का जन्म हुआ यहां के बुजुर्ग और वरिष्ठ जनों के द्वारा यही जानकारी दिया जाता है यही कारण है कि यह क्षेत्र छत्तीसगढ़ के प्रमुख धार्मिक और आस्था के केंद्रों में शुमार होता है।आगे चलकर यह पवित्र पैरी नदी अपनी यात्रा पूरी करते हुए राजिम के प्रसिद्ध त्रिवेणी संगम में महानदी और सोंढूर नदी से मिलती है। पैरी नदी के उदगम स्थल पहाड़ी के ऊपर मंदिर का निर्माण किया गया है यहां की संस्कृति और परंपराएं आदिवासी रीति-रिवाजों से गहराई से जुड़ी हुई हैं, जिसके तहत पारंपरिक रूप से पूजा-पाठ संपन्न होता है। नवरात्रि सहित सभी प्रमुख धार्मिक त्योहारों और पर्वों पर यहां हजारों की संख्या में श्रद्धालुओं का तांता लगता है। श्रद्धालुओं तथा पर्यटको की सुविधा को ध्यान में रखते हुए पहाड़ी पर चढ़ने के लिए सीढ़ियों का निर्माण किया गया है, जिससे आवागमन आसान हो गया है।घने जंगलों और ऊंची पहाड़ियों के बीच बसे इस रमणीय और पवित्र स्थल पर केवल आम लोग ही नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय अजीत जोगी , पूर्व मुख्यमंत्री पंडित श्यामाचरण शुक्ला, पूर्व केंद्रीय मंत्री विद्याचरण शुक्ला, पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम, पूर्व मंत्री एवं संत कवि पवन दीवान, पूर्व मंत्री माधव सिंह ध्रुव, पूर्व विधायक ओंकार शाह, डमरूधर पुजारी, विधायक जनक ध्रुव, पूर्व सांसद चंद्रशेखर साहू सहित कई जनप्रतिनिधि, प्रशासनिक कलेक्टर पुलिस अधीक्षक और बड़े आला अधिकारी भी समय-समय पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं। प्रदेश के कोने-कोने से सैलानी और श्रद्धालु यहां की प्राकृतिक सुंदरता और आध्यात्मिक शांति का अनुभव करने पहुंचते हैं।यदि इस क्षेत्र को पर्यटन मानचित्र पर और अधिक मजबूती से उभारा जाए, तो यह छत्तीसगढ़ का एक बेहतरीन इको-टूरिज्म बन सकता है। यहाँ की प्राकृतिक शांति, ट्रैकिंग का रोमांच और अद्भुत जलधारा पर्यटकों को अपनी ओर खींचने की पूरी क्षमता रखती है।
प्राकृतिक पत्तों के दोना में मिलने वाला चमत्कारी प्रसाद और अटूट मन्नतें:
पैरी नदी के उदगम कुंड से निकलने वाले इस पवित्र और शीतल जल को लेकर एक बेहद खास परंपरा जुड़ी हुई है यहाँ आने वाले श्रद्धालु कुंड के जल को प्राकृतिक वृक्ष के पत्तों के माध्यम से प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। क्षेत्र के लोगों और श्रद्धालुओं की अटूट मान्यता है कि इस पावन जल को जो भी भक्त सच्चे दिल से ग्रहण करता है और अपनी झोली फैलाकर मन्नत मांगता है, उसकी मनोकामना माता पैरी और प्रकृति के आशीर्वाद से अवश्य पूरी होती है। यही वजह है कि यह स्थल केवल प्राकृतिक सौंदर्य का ही नहीं, बल्कि लोगों की गहरी आस्था और विश्वास का एक बड़ा केंद्र बना हुआ है।
विशाल गुफाएं, प्राचीन तलवारें और आदिवासी संस्कृति के गुप्त आस्था केंद्र
भाठीगढ़ की इस रहस्यमयी पहाड़ी पर प्रकृति ने केवल जल और जंगलों की ही अनमोल थाती नहीं बख्शी है, बल्कि यह अपने गर्भ में कई ऐतिहासिक और आध्यात्मिक राज भी समेटे हुए है। इस पहाड़ी पर कई बड़े-बड़े खो (गुहाएं) और प्राकृतिक गुफाएं मौजूद हैं, जो इस क्षेत्र के भूगोल को और भी रोमांचक बनाती हैं।पहाड़ी के अनेक स्थानों पर देवी-देवताओं के पवित्र वास और प्राचीन स्थान स्थापित हैं, जिसके प्रति आदिवासी समाज और क्षेत्र के लोगों की अटूट एवं गहरी आस्था जुड़ी हुई है। इस स्थल का इतिहास रियासतकाल से भी जुड़ा हुआ है। यहाँ की गुफाओं और पहाड़ियों के कई स्थानों पर राजा-महाराजाओं के जमाने की तलवारें और खड़क आज भी सुरक्षित रखे हुए हैं। इन गुप्त और दुर्गम स्थानों पर केवल वही लोग पहुँच पाते हैं जिन्हें इसकी सही जानकारी होती है, और वे हर साल नवरात्रि के विशेष तिथि अवसरों पर वहाँ विशेष पूजा-अर्चना करते हैं,
भाठीगढ पहाड़ी वन्यजीव संसार और आदमखोर मायावती का इतिहास:
मैनपुर का भाठीगढ़ पहाड़ी क्षेत्र सिर्फ धार्मिक और प्राकृतिक सुंदरता का ही केंद्र नहीं है बल्कि यह घने जंगलों से घिरा एक समृद्ध वन्यजीव आवासी क्षेत्र भी है इस पूरे पहाड़ी और जंगली इलाके में नीलगाय, चीतल, सांभर, तेंदुआ, खरगोश और मोर जैसे अनेक वन्य प्राणी आसानी से घूमते हुए दिखाई दे जाते हैं, जो यहाँ की जैव-विविधता को और समृद्ध बनाते हैं।इस क्षेत्र से जुड़ा एक और रोमांचक और चर्चित इतिहास रहा है। आज से लगभग तीन दशक पहले, इस पहाड़ी और जंगली इलाके में एक आदमखोर शेरनी जिसका नाम मायावती और उसका शावक राजाइ आतंक का पर्याय बन गए थे। वन विभाग की कड़ी मशक्कत के बाद इस आदमखोर शेरनी और उसके शावक को इसी पहाड़ी इलाके में पिंजरे में कैद किया गया था, जिसके बाद क्षेत्र के लोगों ने राहत की साँस ली थी यह घटना आज भी यहाँ के स्थानीय लोगों की जुबानी किस्सों में ज़िंदा है।