
मऊमाला नायक ने अपने दल की साथी नृत्यांगनाओं नीतू कुमारी, निशा रॉय, अर्चना शर्मा और विदुषी सिंह के साथ विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश की वंदना से प्रस्तुति की शुरुआत की। इसके बाद भाव-अभिनय के जरिए तुलसीदास और रत्नावली की भावपूर्ण कथा को कथक की अभिव्यक्ति में प्रस्तुत किया गया। कार्यक्रम में चतुरंग की प्रस्तुति भी आकर्षण का केंद्र रही।
राग मालगुंजी और तीनताल पर आधारित इस प्रस्तुति में सरगम, नृत्य, तराना और वाद्य के बोल का सुंदर समावेश देखने को मिला। इसके बाद कथक के शुद्ध तकनीकी पक्ष को प्रस्तुत किया गया। 14 मात्राओं की धमार ताल में उठान, तिपल्ली आमद, चक्रदार तोड़ा, सादा परन, तिहाई और बांट जैसी पारंपरिक बंदिशें पेश की गईं। सधी हुई लयकारी, भाव-भंगिमाओं और पद संचालन ने दर्शकों की खूब तालियां बटोरीं।
‘चंद्रबदनी’ पर डॉ. यास्मीन सिंह की कथक प्रस्तुति
चक्रधर समारोह की सांस्कृतिक संध्या में डॉ. यास्मीन सिंह ने कथक की शानदार प्रस्तुति दी। उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण की वंदना, ‘गोविंदा गोपाला’, ‘झूला गीत’, ‘द्रौपदी’ और महाराजा चक्रधर सिंह की प्रसिद्ध रचना ‘चंद्रबदनी’ को कथक के जरिए प्रस्तुत किया। प्रस्तुति की शुरुआत ‘दिव्य कृष्ण’ से हुई।
भगवान श्रीकृष्ण की वंदना में भक्ति और आध्यात्मिक भावों को कथक की भाव-भंगिमाओं के साथ प्रस्तुत किया गया। इसके बाद ‘गोविंदा गोपाला’ में श्रीकृष्ण के प्रति श्रद्धा, प्रेम और समर्पण के भाव दिखाई दिए।
‘झूला गीत’ में राधा-कृष्ण की प्रेमलीला और प्रकृति की सुंदरता को नृत्य के जरिए साकार किया गया। वहीं ‘द्रौपदी’ में महाभारत के उस प्रसंग को प्रस्तुत किया गया, जिसमें द्रौपदी और भगवान श्रीकृष्ण के सखा-सखी के रिश्ते, विश्वास और निष्ठा को भावपूर्ण ढंग से दिखाया गया।
प्रस्तुति का खास आकर्षण महाराजा चक्रधर सिंह की प्रसिद्ध रचना ‘चंद्रबदनी’ रही। ‘चंद्रबदनी, मृगलोचनी, दामिनी, दुति गोरी, अलबेली नवल नार, करति चित की चोरी…’ जैसे भावपूर्ण शब्दों को कथक की नृत्य-भंगिमाओं के साथ प्रस्तुत करते हुए डॉ. यास्मीन सिंह ने महाराजा चक्रधर सिंह की रचना और रायगढ़ घराने की कथक परंपरा को मंच पर जीवंत किया।
भूपेन्द्र साहू ने दिखाई छत्तीसगढ़ी लोकसंस्कृति की रंगीन छटा
गरियाबंद के वरिष्ठ रंगकर्मी और कलाकार भूपेन्द्र साहू ने छत्तीसगढ़ी लोककला और संस्कृति से सजी प्रस्तुति दी। उनकी प्रस्तुति में छत्तीसगढ़ के लोकगीत, लोकनृत्य, तीज-त्योहार और सांस्कृतिक परंपराओं के अलग-अलग रंग देखने को मिले।
भूपेन्द्र साहू ने ‘हमन नारी आवन वो, सबके महतारी आवन ग’ के जरिए नारी शक्ति का भाव प्रस्तुत किया। इसके बाद छत्तीसगढ़ के राज्य गीत ‘अरपा पैरी के धार’, भोजली गीत और सुवा गीत एवं नृत्य ने प्रदेश की लोक परंपराओं की सुंदर झलक दिखाई।
बाबा गुरु घासीदास के संदेशों को पंथी नृत्य के जरिए प्रस्तुत किया गया। वहीं कर्मा और ददरिया की प्रस्तुतियों ने लोकजीवन के सहज और आत्मीय रंगों को मंच पर जीवंत किया। कार्यक्रम के अंत में श्रीराम स्तुति ने भक्ति का भाव जगाया।