
पेड़ों से टपक रहा महुआ, ग्रामीण अलसुबह ही जंगलों में बिनने जा रहे मगर अचानक बारिश से महुआ की फसल होगी प्रभावित
पूरन मेश्राम।
मैनपुर।वनांँचल क्षेत्रों में महुआ पीला सोना के नाम से विख्यात है। यह वनवासियों के आजीविका का साधन होने के साथ ही साल भर में कम से कम 3 महीनों के लिए पर्याप्त आर्थिक स्रोत का साधन माना जाता है। अभी सीजन महुआ फूल का चल रहा है जिसके संग्रहण के लिए ग्रामीण अंचलों में बच्चें,बूढे,जवान,महिला पुरुष सभी 4 बजे पहट में ही भात, पेज, बासी, चटनी लेकर अपने अपने टिकरा खेत एवं जंगलों की ओर चले जाते हैं। अधिकांश परिवार के पास लगभग न्यूतम 15 से 30 महुआ का पेड़ रहता ही है। पेड़ से महुआ फूल का हर रोज संग्रहण करते हुए दोपहर से लेकर शाम तक अपने अपने घर पहुंँचते हैं। जिनके पास महुआ का पेड़ नहीं होता है, वे लोग जंगलों की तरफ जा करके महुआ बिनते है। किसी के पास ज्यादा महुआ के पेड़ होने से नहीं बिन पाने की स्थिति में परस्पर मैत्री भाव से वे अधिया हिस्सेदारी में भी बिनने के लिए दे देते हैं।
*मचान में बैठकर करते हैं पीला सोना की सुरक्षा*
गांँव के मवेशी रात्रि में जाकर गिरे हुए महुआ को ना खाएं। अधिकांश ग्रामीण अपने-अपने टिकरा खेत में मचान रहने के झोपडी. बनाकर रतजगा करते हैं। ताकि मवेशियों से महुआ फूल को बचाया जा सके। इसके कारण कभी कभी जंगली जानवरों से भी ग्रामीणों को दो चार होते हुए देखा गया है। इस सीजन में दिन के समय गाँव मे वीरानी छाई रहती है। दिन रात मेहनत करते हुए एक परिवार कम से कम न्यूनतम 6 क्विंटल से 17 क्विंटल तक महुआ का संग्रहण कर लेते हैं। कम से कम 3 महीना दैनिक जरूरतों को पूरी करने के लिए महुआ फूल पर ही वनवासी निर्भर रहते हैं।
*सही कीमत नहीं मिलने से चिंतित*
वनांँचल वासी के लिए महुआ को लघु वनोपज के श्रेणी में रखते हुए सरकार द्वारा समर्थन मूल्य तय किया गया है। लेकिन इधर समितियों में खरीदी की स्थिति नहीं दिख रही है। शुरूआती दौर में व्यापारियों के द्वारा महुआ के दाम 40 से 45 रुपये किलो निर्धारण किया गया था लेकिन वर्तमान स्थिति में 30 से 40 रुपये की दर पर महुआ की खरीदी की जा रही है। सरकार द्वारा कहा जाता है महुआ का विदेशों में भी मांग के साथ ही इससे औषधि निर्माण भी किया जा रहा है। उसके बावजूद कम कीमत में महुआ (पीला सीना) के दाम से ग्रामीण अंचलों के मजदूर किसान बेहद परेशान होने लगे हैं। व्यापारियों द्वारा 35 से 40 में ही खरीदी करते हुए इसका दाम गिर जाने से ऐसी स्थिति आने का भी हवाला दिया जा रहा है। जिसका असर कुछ बाजारों में देखने को भी मिला। महुआ का वाजिब दाम वनवासियों को शुरू से ही नहीं मिल पाता जिसके कारण ओने पौने दामों में बिचौलियों के पास बिक्री के लिए मजबूर रहते हैं। बताया जाता है कि इस समय बंपर महुआ फूल आ रही है।
उल्लेखनीय है कि जंगलों में रहने वाले वनवासी महुआ पेड़ को अपना इष्ट देव मानते हुए कुलदेवता पुरखा में इसके फूल को अर्पण करते हैं। विवाह में महुआ के पान (डारा) का उपयोग गांव के झाँकर पुजारी द्वारा किया जाता है। विवाह के पूर्व मंडप में इसके डाल को लगाने की परंपरा आदिवासी समाज में वर्षों से चली आ रही है। जंगलों में रहने वाले वनवासियों में वर्षों से अपने शरीर को तरोताजा एवं तंदुरुस्त रखने के लिए महुआ फूल के लड्डू (चपेना) बनाकर उसका उपयोग भी किया जाता है। आधुनिकता के दौर में धीरे-धीरे
इसका उपयोग कम होने लगा है।
जंगलों में निवास करने वाले वनवासियों के लिए प्रकृति प्रदत चार, तेन्दू, सरई, महुआ नैसर्गिक उपलब्ध होने के साथ ही इसे आजीविका का मुख्य स्रोत माना जाता है।
*अचानक बारिश ने महुआ की फसल को किया प्रभावित*
बीते रात्रि को अचानक बारिश होने के कारण महुआ की फसल प्रभावित होगी जिसके कारण संग्राहक परिवार बेहद चिंतित नजर आ रहे हैं।