बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्मों में से एक जोगी बिठाई की रस्म सोमवार शाम पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। ग्राम बड़े आमाबाल के युवक दौलत तीसरी बार इस परंपरा का निर्वहन करते हुए जगदलपुर के सिरहासार भवन में करीब 4 फीट गहरे कुंड में तपस्या के लिए बैठे हैं।
वे अगले 9 दिनों तक निराहार व्रत रखकर देवी की आराधना करेंगे। इस साधना का उद्देश्य बस्तर दशहरा का निर्विघ्न और शांतिपूर्ण आयोजन और बस्तर की सुख-समृद्धि की कामना करना है। वहीं, मंगलवार से चार चक्कों वाले फूल रथ की परिक्रमा भी शुरू होगी।
मावली मंदिर में पूजा के बाद शुरू हुई रस्म
करीब 618 साल पुरानी परंपरा के अनुसार, सोमवार शाम जोगी बिठाई की रस्म की शुरुआत मावली माता मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ हुई। पुजारी ने दीप प्रज्ज्वलित कर देवी की आराधना की। इसके बाद मंदिर में स्थापित पारंपरिक पवित्र तलवार का विधि-विधान से पूजन किया गया।
बस्तर दशहरा की महत्वपूर्ण रस्मों में से एक जोगी बिठाई की रस्म सोमवार शाम पूरे विधि-विधान के साथ संपन्न हुई। ग्राम बड़े आमाबाल के युवक दौलत तीसरी बार इस परंपरा का निर्वहन करते हुए जगदलपुर के सिरहासार भवन में करीब 4 फीट गहरे कुंड में तपस्या के लिए बैठे हैं।
वे अगले 9 दिनों तक निराहार व्रत रखकर देवी की आराधना करेंगे। इस साधना का उद्देश्य बस्तर दशहरा का निर्विघ्न और शांतिपूर्ण आयोजन और बस्तर की सुख-समृद्धि की कामना करना है। वहीं, मंगलवार से चार चक्कों वाले फूल रथ की परिक्रमा भी शुरू होगी।
मावली मंदिर में पूजा के बाद शुरू हुई रस्म
करीब 618 साल पुरानी परंपरा के अनुसार, सोमवार शाम जोगी बिठाई की रस्म की शुरुआत मावली माता मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ हुई। पुजारी ने दीप प्रज्ज्वलित कर देवी की आराधना की। इसके बाद मंदिर में स्थापित पारंपरिक पवित्र तलवार का विधि-विधान से पूजन किया गया।
पूजा संपन्न होने के बाद जोगी दौलत पवित्र तलवार धारण कर मुंडाबाजा और गाजे-बाजे की धुनों के बीच सिरहासार भवन पहुंचे। यहां प्रार्थना और धार्मिक विधान पूरे करने के बाद उन्होंने करीब 4 फीट गहरे कुंड में पालथी मारकर आसन ग्रहण किया।
इसके साथ ही उन्होंने 9 दिनों तक कठिन तपस्या और निराहार व्रत करने का संकल्प लिया।
दशहरे में बाधा नहीं आए, इसलिए करते हैं तपस्या
बस्तर दशहरा की जोगी बिठाई रस्म अपनी अनूठी परंपरा के लिए जानी जाती है। मान्यता है कि जोगी की तपस्या से देवी प्रसन्न होती हैं और दशहरा पर्व के सभी विधान निर्विघ्न संपन्न होते हैं। जोगी विजयादशमी तक साधना में लीन रहते हैं। उनकी तपस्या बस्तर की सुख-समृद्धि और शांति की कामना से जुड़ी है।
इस परंपरा में केवल पुरुष ही जोगी की भूमिका निभाते हैं। मांझी, चालकी और पुजारियों की मौजूदगी में धार्मिक विधान पूरे किए जाते हैं। इस दौरान जोगी को नए वस्त्र पहनाकर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ मंदिर ले जाया जाता है। देवी की पूजा और पवित्र तलवार के पूजन के बाद जोगी तपस्या के लिए बैठते हैं।
ग्राम बड़े आमाबाल निवासी दौलत इस साल तीसरी बार जोगी बिठाई की रस्म निभा रहे हैं। 9 दिनों की कठिन साधना के दौरान वे कुंड में बैठकर देवी की आराधना करेंगे। इस अनुष्ठान में जोगी परिवार के सदस्यों के साथ मांझी-चालकी और पुजारियों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है।
आज से शुरू होगी फूल रथ की परिक्रमा
जोगी बिठाई के बाद अब बस्तर दशहरा के अगले महत्वपूर्ण विधान के रूप में मंगलवार से चार चक्कों वाले फूल रथ की परिक्रमा शुरू होगी। फूल रथ पर देवी दंतेश्वरी के छत्र को विराजित किया जाएगा। इसके बाद रथ को सिरहासार भवन से गोलबाजार चौक होते हुए मां दंतेश्वरी मंदिर तक ले जाया जाएगा।