माँ अंगारमोती मंदिर का रहस्य
अग्नि से प्रकटीकरण: मान्यता है कि सिहावा के पास गठुला की पहाड़ियों पर ऋषि अंगीरा के तप और अग्नि से माँ अंगारमोती का जन्म (स्वयंभू प्रकटीकरण) हुआ था, इसलिए इन्हें ‘अंगारमोती’ कहा जाता है।
600 साल पुराना इतिहास और चोरी की घटना: पुराना मंदिर चंवरगांव में था। कहा जाता है कि एक बार चोरों ने मूर्ति चुराने की कोशिश की थी, लेकिन केवल उनके चरण ही ले जा सके और बाकी मूर्ति वहीं रह गई। आज भी उस स्थान पर माँ के चरणों की पूजा होती है।
गंगरेल बांध का निर्माण और पुनर्स्थापना: वर्ष 1972-73 में जब महानदी पर गंगरेल बांध का निर्माण हुआ, तब पुराना मंदिर डूब क्षेत्र में आ गया। इसके बाद माता की नई प्रतिमा को बांध के तट पर पुनर्स्थापित किया गया।
52 गांवों की संरक्षक देवी: माँ अंगारमोती को आसपास के 52 गांवों की इष्ट देवी और अधिष्ठात्री माना जाता है।
संतान प्राप्ति की परंपरा (बैगा का चलना):• दीपावली के ठीक बाद आने वाले प्रथम शुक्रवार को यहाँ प्रसिद्ध गंगरेल मड़ई मेला लगता है।
• इस मेले में संतान सुख से वंचित सैकड़ों महिलाएं दूर-दूर से आती हैं।
• ये महिलाएं मंदिर परिसर में पेट के बल (दंडवत) जमीन पर लेट जाती हैं।
• इसके बाद देवी से प्रेरित होकर झूमते-बेसुध हुए आदिवासी बैगा (पुजारी) ढोल-नगाड़ों की गूंज के बीच उन लेटी हुई महिलाओं की पीठ/शरीर के ऊपर से चलकर मंदिर की तरफ आगे बढ़ते हैं।
• ऐसी अटूट मान्यता है कि ऐसा होने से निसंतान महिलाओं की सूनी गोद भर जाती है और उन्हें संतान सुख प्राप्त होता है।