गरियाबंद में 2 नवम्बर को कटोरा लेकर सड़क में उतरेंगे सरपंच, बड़े आंदोलन को लेकर तैयारी

Chhattisgarh Crimesयुमेन्द्र कश्यप/गरियाबंद। गांव की सड़क खराब हो तो उलाहना सरपंच को, नाली जाम हो तो शिकायत सरपंच से और विकास कार्य रुक जाएं तो जवाब भी जनता सीधे सरपंच से ही मांगती है। लेकिन, जिन कंधों पर गांवों के विकास का जिम्मा है, अगर उनके खुद के हाथ खाली हों और खजाने की चाबी पर पहरा बैठा हो, तो वे विकास का पहिया कैसे घुमाएं? गरियाबंद जिले में कुछ ऐसी ही आर्थिक बदहाली से जूझ रहीं ग्राम पंचायतों का गुस्सा अब खुलकर सड़क पर आने लगा है। महीनों से अटका भुगतान और खाली हो चुके खातों से परेशान जिला सरपंच संघ ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान करते हुए 2 नवंबर को जिला मुख्यालय में उग्र प्रदर्शन की रूपरेखा तैयार कर ली है।

● कटोरा लेकर अनोखे विरोध प्रदर्शन की तैयारी

इस बार सरपंच संघ का विरोध प्रदर्शन बेहद अनोखे और सांकेतिक अंदाज में होगा। पंचायत प्रतिनिधि हाथों में कटोरा लेकर अपनी ही बकाया राशि की मांग करेंगे। इस प्रदर्शन का सीधा संदेश है कि जिस सरकार और व्यवस्था पर गांवों के विकास की उम्मीद टिकी है, आज वही पंचायतें अपनी ही मेहनत और हक की राशि के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हैं।

जिला सरपंच संघ गरियाबंद एवं समस्त उपसरपंच-पंचगण की ओर से इस संबंध में 21 अक्टूबर को ही पुलिस अधीक्षक को रैली की विधिवत सूचना दी जा चुकी है। तय कार्यक्रम के मुताबिक, 2 नवंबर (सोमवार) को सुबह 11 बजे कुमार भवन, सिविल लाइन गरियाबंद से प्रदर्शन की शुरुआत होगी। यह रैली शहर के मुख्य मार्गों यानी बस स्टैंड से होते हुए जिला कलेक्टर कार्यालय पहुंचेगी, जहां प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर लंबित राशियों का तत्काल भुगतान करने की कड़ी मांग रखी जाएगी।

● 30 करोड़ का मनरेगा भुगतान और 6 महीने से अटका मानदेय

​सरपंच संघ द्वारा तैयार किए गए एजेंडे में सबसे बड़ा मुद्दा मनरेगा के तहत हुए कार्यों का है। संघ के आंकड़ों के मुताबिक, जिले में मनरेगा के अंतर्गत लगभग 30 करोड़ रुपये के काम धरातल पर कराए जा चुके हैं, लेकिन मजदूरी और सामग्री की यह भारी-भरकम राशि पिछले करीब 8 महीनों से अटकी पड़ी है।​यही नहीं, पंचायतों के सामने वित्तीय संकट की स्थिति और भी विकट है।
​मूलभूत और 16वें वित्त आयोग की राशि का महीनों से अतापता नहीं है। निर्माण कार्यों का मूल्यांकन (मूल्यांकन) और सत्यापन (सत्यापन) पूरा होने के बावजूद 5 से 6 महीने से भुगतान रुका हुआ है। जमीनी स्तर की रीढ़ कहे जाने वाले उपसरपंचों और पंचों का मानदेय भी लंबे समय से लंबित है, जिससे ग्रामीण जनप्रतिनिधियों में गहरा आक्रोश है।

● किसानों के मुआवजे का मुद्दा भी जुड़ेगा

सरपंच संघ ने अपनी इस लड़ाई को केवल पंचायत के खातों तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि जनता के दर्द को भी अपनी आवाज बनाया है। आंदोलन के पोस्टरों और मांगों में हालिया बारिश से हुई फसल क्षति का सर्वे कराकर प्रभावित किसानों को मुआवजा देने की मांग भी प्रमुखता से शामिल की गई है।

● ​प्रशासन के सामने दोहरी चुनौती

ग्रामीण इलाकों की लोकतांत्रिक व्यवस्था की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि जनता अपनी हर समस्या के लिए सीधे स्थानीय जनप्रतिनिधियों को घेरती है। लेकिन जब पंचायतों के पास एक फूटी कौड़ी भी न हो, तो वे स्थानीय जरूरतों को कैसे पूरा करें?
​संघ ने दो टूक चेतावनी दी है कि यदि 2 नवंबर को होने वाले इस प्रदर्शन के बाद भी मांगों का संतोषजनक निराकरण नहीं किया गया, तो आंदोलन को और तेज करते हुए कार्यालयों का घेराव और चक्काजाम जैसे कदम उठाए जाएंगे। फिलहाल, गरियाबंद जिला प्रशासन के सामने चुनौती सिर्फ एक बड़े प्रदर्शन को शांतिपूर्ण ढंग से संभालने की नहीं, बल्कि पंचायतों की आर्थिक बदहाली और ग्रामीण विकास से जुड़े इन तीखे सवालों का संतोषजनक जवाब देने की भी है।