
जांच में यह भी पता चला है कि वसूली की रकम किसे दी गई, इसका इस्तेमाल राजनीतिक और निजी कामों में कैसे हुआ और जमीन, फ्लैट, वाशरी में पैसा लगाया गया। EOW के अनुसार, यह पूरा सिस्टम तैयार करने में करीब 5 करोड़ रुपए का लेन-देन हुआ था। जांच में सामने आया है कि पप्पू बंसल ने रकम दी।
निखिल चंद्राकर और नवनीत ने रकम लेकर सूर्यकांत तिवारी तक पहुंचाई। सिंडिकेट के लोग आपस में बात करने और पैसों से जुड़े निर्देश देने के लिए 7 अलग-अलग वॉट्सऐप ग्रुप चलाते थे। जांच में जब्त मोबाइल, वॉट्सऐप चैट, डायरियों और बैंक लेन-देन से मिली जानकारी को चालान में शामिल किया गया है।
15 जुलाई के आदेश के बाद शुरू हुआ वसूली का सिस्टम
EOW की जांच के अनुसार, 15 जुलाई 2020 के आदेश के बाद ऑनलाइन ई-परमिट जारी करने से पहले जिला खनिज अधिकारी की मंजूरी अनिवार्य कर दी गई थी। एजेंसी का आरोप है कि इसी व्यवस्था का इस्तेमाल कोयला कारोबारियों और परिवहनकर्ताओं से 25 रुपए प्रति टन की कथित अवैध वसूली के लिए किया गया।
जांच के मुताबिक, अलग-अलग जिलों से रकम रायपुर पहुंचाई जाती थी। यहां रकम का हिसाब रखने के बाद आगे इसका वितरण किया जाता था।
जिलों में बैठकें, ‘सीएम हाउस’ के नाम से बुकिंग
EOW ने दावा किया है कि अनुराग दीवान के जब्त मोबाइल से 15 जुलाई 2020 के आदेश से जुड़े डिजिटल सबूत मिले हैं। जांच के अनुसार, सूर्यकांत तिवारी और उसके सहयोगी अलग-अलग जिलों में जाकर बैठकें करते थे।
उनके ठहरने के लिए विश्राम गृहों में ‘सीएम हाउस’ के नाम से बुकिंग कराए जाने के साक्ष्य भी मिले हैं। बालको और अंबुजा से जुड़े पत्राचार को भी चालान में शामिल किया गया है। EOW के अनुसार, एक पत्राचार में परिवहन बिलों में 25 रुपए प्रति टन की राशि जोड़ने का उल्लेख है।