
अब यहां राम, लक्ष्मण, सीता, हनुमान, रावण और अंगद समेत रामलीला के प्रमुख किरदार गांव की बेटियां निभाती हैं। करीब 25 युवतियों की यह टोली 13 साल से इस परंपरा को आगे बढ़ा रही है। विजयादशमी पर इनका मंचन देखने हजारों की संख्या में दर्शक पहुंचते हैं।
इस रामलीला की खासियत सिर्फ यह नहीं कि इसमें बेटियां पुरुष पात्रों का अभिनय करती हैं, बल्कि यह भी है कि गांव की संस्कृति से उनका जुड़ाव शादी के बाद भी बना रहता है। भगवान राम का किरदार निभाने वाली शिवानी चंद्राकर शादी के 2 साल बाद भी अपने मायके लौटकर मंच पर उतरती हैं।
रानी यादव 7 साल से रावण का किरदार निभा रही हैं। वहीं अंगद बनने वाली गोल्डी यादव रामलीला के साथ वेटलिफ्टिंग में भी स्टेट और नेशनल लेवल तक पहुंच चुकी हैं।
2013 में बेटियों ने संभाली कमान
रामलीला समिति के संरक्षक खिलावन चंद्राकर के मुताबिक तर्रा गांव में दशहरा और रामलीला का आयोजन करीब 85-90 साल से हो रहा है। पहले इसमें पुरुष किरदार निभाते थे, लेकिन युवाओं की अनियमित भागीदारी के कारण आयोजन में परेशानी आने लगी।
साल 2013 में तत्कालीन सरपंच लता चंद्राकर ने बेटियों को रामलीला में मौका देने का फैसला किया। उनके कार्यकाल में पहली बार लड़कियों ने सभी प्रमुख किरदार निभाए। गांववालों ने इस पहल को सराहा और धीरे-धीरे यह प्रयोग परंपरा बन गया।
अब 15 से 25 साल तक की बेटियां इस आयोजन से जुड़ी हैं। इनमें स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाली छात्राएं भी शामिल हैं। करीब 25 कलाकार हर साल विजयादशमी पर मंचन की तैयारी करती हैं और अपनी भूमिकाओं को जीवंत करती हैं।