
सुरक्षा कारणों से वर्षों तक बस्तर दशहरा में शामिल होने से वंचित रहे ग्रामीणों ने इस बार पूरे उत्साह के साथ हिस्सा लिया। सुदूर 50 गांवों के लोगों की सीधी भागीदारी ने इस आयोजन को स्थानीय परंपराओं और सामुदायिक जुड़ाव के दृष्टिकोण से अत्यंत खास बना दिया। अंदरूनी क्षेत्रों के निवासियों ने पारंपरिक रीति-रिवाजों का पूरी निष्ठा के साथ पालन किया और उत्सव की गतिविधियों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। इस सहभागिता ने बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और जनसामान्य की धार्मिक आस्था के संबंधों को पुनः प्रगाढ़ किया है।
आयोजन के दौरान बस्तर दशहरा की प्रमुख धार्मिक परंपराओं में देवी-देवताओं की अभूतपूर्व मौजूदगी दर्ज की गई। प्रशासनिक आंकड़ों के अनुसार माउली परघाव की प्रसिद्ध रस्म में 954 देवी-देवता शामिल हुए। इसके अलावा भीतर रैनी की अत्यंत महत्वपूर्ण रस्म के दौरान 461 देवी-देवताओं की उपस्थिति दर्ज की गई। इन वृहद आंकड़ों ने इस वर्ष के बस्तर दशहरा महोत्सव की भव्यता, जन-समर्थन और क्षेत्रीय आस्था के व्यापक विस्तार को स्पष्ट रूप से दर्शाया है।
सुदूर क्षेत्रों से ग्रामीणों के जगदलपुर पहुंचने में सड़क निर्माण और शांति व्यवस्था का प्रमुख योगदान रहा। पुलिस अधीक्षक शलभ सिन्हा के अनुसार अंदरूनी इलाकों में सड़कों की स्थिति बेहतर होने और शांति का माहौल बनने से ग्रामीणों के लिए जगदलपुर तक आना आसान हुआ है। उन्होंने बताया कि सुरक्षा कारणों से जो 50 गांव पहले बस्तर दशहरा में नहीं आ पाते थे, वहां के ग्रामीण इस बार पूरे आयोजन के दौरान जगदलपुर में उपस्थित रहे। इसके अलावा छत्तीसगढ़ के विभिन्न हिस्सों, देश के अन्य राज्यों और विदेश से भी बड़ी संख्या में पर्यटक बस्तर दशहरा की इस अनूठी परंपरा को देखने पहुंचे।