
इसके पीछे वजह कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने संस्कृति और सभ्यता का प्रसार करना बताया। उन्होंने सरकार से देश के मंदिरों के लिए सनातन बोर्ड बनाने की भी मांग की। दरअसल, रायपुर में उनकी श्रीमद्भागवत कथा शुरू हो चुकी है।
देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि सनातन संस्कृति हमें सही तरीके से जीवन जीना सिखाती है। भगवान श्रीराम, भगवान श्रीकृष्ण और हमारे महापुरुषों ने वेदों, पुराणों और ऋषि-मुनियों के ज्ञान को अपने जीवन में अपनाया था। आज हमें भी उसी परंपरा और भारतीय संस्कृति को आगे बढ़ाने की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि मैकाले की शिक्षा व्यवस्था के कारण नई पीढ़ी अपनी जड़ों और संस्कृति से दूर होती जा रही है। इसका असर आज समाज में साफ दिखाई देता है। हमें फिर से अपनी संस्कृति, परंपराओं और अच्छे मूल्यों को अपनाने की जरूरत है।
कथा में ‘नो तिलक, नो एंट्री’
कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर ने बताया कि भागवत कथा में ‘नो तिलक, नो एंट्री’ का नियम रखा गया है। उन्होंने कहा कि इसका मकसद लोगों, खासकर बच्चों को सनातन संस्कृति और भारतीय परंपराओं से जोड़ना है।
उन्होंने पेरेंट्स से अपील की कि वे खुद आएं या न आएं, लेकिन अपने बच्चों को जरूर कथा में भेजें। इससे बच्चे सनातन धर्म, भारतीय संस्कृति और अपनी गौरवशाली परंपराओं को बेहतर तरीके से जान सकेंगे।
देवकीनंदन ठाकुर ने कहा कि जब तक नई पीढ़ी तिलक जैसी अपनी सांस्कृतिक पहचान और विरासत को नहीं समझेगी, तब तक वह जीवन के सही संस्कार और मूल्यों को पूरी तरह नहीं अपना पाएगी। उनके अनुसार, सनातन केवल एक धर्म नहीं, बल्कि जीवन जीने का सही तरीका सिखाता है।