
कुंजाम के मुताबिक, ये प्रक्रिया बस्तर की विशिष्ट जनजातियां के लिए कठिन है। जिसके कारण उन्हें कठिनाई हो रही है। ऐसे में आशंका है कि लाखों लोगों के नाम एनरोलमेंट लिस्ट से हट सकते हैं। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट में 1 नवंबर को इस मामले में सुनवाई होगी। लाखों लोगों के नाम लिस्ट से हटने का आशंका
कुंजाम ने याचिका में कहा है कि बस्तर के आंतरिक, पहाड़ी और जंगल क्षेत्रों में रहने वाले आदिवासी पारंपरिक जीवनशैली के कारण दस्तावेजों और पहचान संबंधी औपचारिकताओं को पूरा नहीं कर पाते। ऐसे में एसआईआर के दौरान कड़ी जांच और अनुपालन की बाध्यता उनके नाम मतदाता सूची से हटाने का बड़ा कारण बन सकती है।
उन्होंने आशंका जताई कि यदि यह प्रक्रिया बिना व्यावहारिक संशोधनों के आगे बढ़ी तो हजारों नहीं, बल्कि लाखों लोगों के नाम एनरोलमेंट लिस्ट से हट सकते हैं। याचिका में भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयोग को पार्टी बनाया गया है।
कुंजाम ने कहा कि सलवा जुडूम के समय में 644 गांव विरान हो गए थे। हजारों लोगों के घर जलाए गए। उनके पास कागजात नहीं है। कई गांव जंगल में है। कोई भी BLO इतनी दूर नहीं पहुंच सकता। ग्रामीण भी उन नहीं पहुंच पा रहे। समय सीमा भी कम है। इन सभी दिक्कतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे है।