राज्य सरकार ने छह प्रमुख नदियों में गिर रहे नाले के गंदे पानी को लेकर प्रदेश के सभी नगरीय निकायों से जवाब-तलब किया है। नगरीय प्रशासन विभाग ने सभी नगर निगमों के आयुक्त, नगर पालिका और पंचायतों के मुख्य नगर पालिका अधिकारियों को पत्र जारी कर जवाब मांगा।
अधिकारियों को बताना है कि उनके नगरीय निकाय क्षेत्र में संबंधित नदी में कितने नाले हैं? उसकी लंबाई कितनी है और कितना पानी नदी में मिल रहा है? यह भी बताना होगा कि एसटीपी कब लगाया? कितनी क्षमता का है? कितनी अतिरिक्त क्षमता की एसटीपी होनी चाहिए? यह कार्रवाई नदी पुनर्जीवन समिति की बैठक में सामने आए तथ्यों के आधार पर की गई है।
नदी पुनर्जीवन समिति की बैठक में यह बात सामने आई कि महानदी, अरपा, खारुन, केलो, शिवनाथ और हसदेव के किनारे लगे सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट अपनी क्षमता से काम नहीं कर रहे हैं। नतीजा शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों के नालों का गंदा पानी सीधे नदियों को प्रदूषित कर रहा है। ये नदियां रायपुर से लेकर बिलासपुर, दुर्ग सहित कई प्रमुख जिलों से गुजरती हैं।
नदियों में प्रदूषण स्तर चिंताजनक राजधानी रायपुर में खारुन नदी के किनारे कारा, निमोरा और चंदनीडीह में तीनों मिलाकर 200 एमएलडी क्षमता के प्लांट लगे हैं। भाठागांव एनीकट के पास छह एमएलडी का अतिरिक्त प्लांट लगा है। इसी तरह प्रदेश के अन्य नगरीय निकायों में 18 सीवरेज ट्रीटमेंट प्लांट चल रहे हैं।
इनकी क्षमता 408 एमएलडी है। केंद्रीय प्रदूषण निवारण मंडल की रिपोर्ट में इन नदियों में प्रदूषण की मात्रा अधिक बताई गई है। दैनिक भास्कर ने 13 जनवरी के अंक में इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित की थी। इसी के बाद नगरीय प्रशासन विभाग ने सभी नगरीय निकायों के आयुक्त और मुख्य कार्यपालन अधिकारियों से जवाब मांगा।
इसलिए जरूरी है नदियों का प्रदूषण रहित होना इन नदियों के पानी का ही उपयोग नगरीय निकायों में पीने के लिए किया जाता है। लिहाजा नदियों का प्रदूषणरहित होना जरूरी है। रायपुर में रोज 300 एमएलडी पानी की जरूरत पड़ती है। इसके लिए पानी खारुन नदी से लिया जाता है। नदी ज्यादा प्रदूषित होने पर नगरीय निकायों को पानी को साफ करने के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ता है।
इससे उनपर आर्थिक भार पड़ता है। लाखों लोगों की सेहत इन नदियों के पानी पर ही निर्भर करता है। अधिक प्रदूषण से नदियों मेंं जलीय जीव-जंतुओं के जीवन पर भी असर पड़ता है। अफसरों का कहना है कि नदी में मिलने वाले गंदे पानी की मात्रा और एसटीपी की क्षमता का आकलन करने के बाद संबंधित नगरीय निकायों से अतिरिक्त प्लांट स्थापित करने का प्रस्ताव मंगाया जाएगा।