
यह मामला केवल जमीन विवाद नहीं, बल्कि कथित तौर पर सुनियोजित साजिश, कूटरचना और धोखाधड़ी से जुड़ा हुआ है।
प्रार्थी रामानंद पटेल (लगभग 55 वर्ष), निवासी ग्राम झींट, तहसील पाटन ने न्यायालय में आवेदन देकर आरोप लगाया कि आरोपियों ने उनकी लगभग 2.40 हेक्टेयर कृषि भूमि को छलपूर्वक हड़प लिया है।
इस भूमि में खसरा नंबर 531/1, 557, 562/3, 829/2 सहित कुल 11 खसरे शामिल हैं। आवेदक का दावा है कि यह जमीन पूरी तरह उनके नाम, स्वामित्व और कब्जे में थी।
मामले की शुरुआत साल 2015 में हुई थी। उस समय रामानंद पटेल ने जरूरत पड़ने पर दौवाराम पटेल से ब्याज पर पैसे लिए थे। इसके बदले में उन्होंने 26 अक्टूबर 2015 को अपनी जमीन के लिए एक रजिस्टर्ड पावर ऑफ अटॉर्नी बनाई थी, जो केवल 2 साल के लिए मान्य थी।
हालांकि, 10 अगस्त 2017 को कर्ज चुकाने के बाद, रामानंद पटेल ने इस पावर ऑफ अटॉर्नी को विधिवत निरस्त कर दिया था और इसकी जानकारी आरोपी को भी दे दी गई थी।
आरोप है कि 13 सितंबर 2017 से 2019 तक रामानंद पटेल जिला जेल दुर्ग में बंद थे। इसी दौरान आरोपियों ने उनकी इस स्थिति का फायदा उठाते हुए जमीन पर कब्जा करने की साजिश रची। आरोपियों में शामिल अधिवक्ता आशुतोष शुक्ला और कल्याण दास बघेल ने कथित तौर पर जेल जाकर एक नया खास मुख्तारनामा तैयार कराया, जबकि पुराना मुख्तारनामा पहले ही निरस्त हो चुका था।
बैंक लोन चुकाकर दस्तावेज कब्जे में लिए
मामले में एक और आरोपी अशोक खटवानी ने जमीन पर चल रहे बैंक के केसीसी लोन को जमा कर दस्तावेज अपने कब्जे में ले लिए।
इसके बाद आरोप है कि दौवाराम पटेल ने अन्य आरोपियों के साथ मिलकर 24 अक्टूबर 2017 को, निरस्त हो चुके पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर जमीन की रजिस्ट्री कर दी।
यह रजिस्ट्री उनके रिश्तेदारों और सहयोगियों लता बाई पटेल, कमलकिशोर पटेल, मानसिंह साहू और अन्य के नाम पर की गई।
कोर्ट में ही खुला फर्जीवाड़ा
इस मामले में सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि एक अन्य सिविल वाद के दौरान खुद आरोपी पक्ष के गवाह ने न्यायालय में स्वीकार किया कि 10 अगस्त 2017 को पावर ऑफ अटॉर्नी निरस्त हो चुकी थी।
गवाही में यह भी माना गया कि इसके बाद की गई रजिस्ट्री छल, कपट और कूटरचना की श्रेणी में आती है। यानी, कोर्ट के सामने ही यह स्पष्ट हो गया कि जमीन की बिक्री अवैध तरीके से की गई थी।
पुलिस पर कार्रवाई न करने का आरोप
रामानंद पटेल ने पहले थाना अमलेश्वर और पुलिस अधीक्षक दुर्ग को शिकायत दी थी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। इससे निराश होकर उन्होंने न्यायालय की शरण ली, जहां से धारा 175(3) BNSS के तहत पुलिस को FIR दर्ज करने का आदेश मिला।
इन धाराओं में दर्ज हुआ मामला
कोर्ट के आदेश के बाद पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 318(4) (धोखाधड़ी), 340 (कूटरचना), 61(1) और 3(5) (साझा आपराधिक साजिश) के तहत अपराध दर्ज किया है।
इन धाराओं में दोष सिद्ध होने पर आरोपियों को कड़ी सजा का प्रावधान है।
जांच में खुल सकते हैं और राज
पुलिस अब इस पूरे मामले की जांच कर रही है। जमीन की रजिस्ट्री, बैंक दस्तावेज, पावर ऑफ अटॉर्नी और जेल में हुए कथित दस्तावेजी लेनदेन की जांच की जा रही है।
माना जा रहा है कि जांच के दौरान और भी लोगों की भूमिका सामने आ सकती है।