
ग्रामीणों ने बताया कि जब उन्होंने वनकर्मियों से सवाल किया तो उन्हें ‘कूप कटाई’ की बात कही गई। हालांकि, मौके पर पहुंचने पर उन्हें महुआ, तेंदू, चार सहित कई फलदार और लघु वनोपज देने वाले पेड़ कटे हुए मिले। ग्रामीणों का कहना है कि ये पेड़ उनकी रोजमर्रा की आजीविका का आधार हैं।
कटाई स्थल पर पहुंचकर ग्रामीणों का विरोध
ग्रामीणों ने कटाई स्थल पर पहुंचकर विरोध प्रदर्शन किया और पेड़ों की सुरक्षा की मांग की। बड़ी संख्या में ग्रामीण वहां जमा हुए। विवाद बढ़ता देख डीएफओ रामकृष्ण, एसडीओ वन और उनकी टीम मौके पर पहुंची। विभाग ने स्पष्ट किया कि यह पूरी प्रक्रिया ‘कूप कटाई’ के तहत हो रही है।
सूखे और खराब पेड़ों की ही हो रही कटाई
इसमें केवल सूखे, गिरे हुए और खराब पेड़ों को ही काटा जा रहा है। डीएफओ रामकृष्ण ने ग्रामीणों को समझाया कि यह जंगल के प्राकृतिक नवीनीकरण की प्रक्रिया है। उन्होंने आश्वस्त किया कि हरे पेड़ नहीं काटे जा रहे हैं। कटे हुए लट्ठों को डिपो में ले जाकर नीलाम किया जाएगा और नीलामी की राशि का 20% ग्राम विकास कार्यों पर खर्च किया जाएगा।
ग्रामीणों ने जताई जंगल खत्म होने की आशंका
बता दें कि नक्सली गतिविधियों के कारण पिछले 20 वर्षों से इन जंगलों में ‘कूप कटाई’ बंद थी। सुरक्षा स्थिति में सुधार के बाद विभाग ने इसे फिर से शुरू किया है, जिससे यह विवाद खड़ा हो गया है। एक ग्रामीण ने आशंका व्यक्त की कि यदि ये पेड़ खत्म हो गए, तो जंगल पर निर्भर आदिवासी कहां जाएंगे।