
शिखा दास
महासमुन्द
पिथौरा मे
अक्षय तृतीया परशुराम जयंती पर्व पर!
कौन कौन जिम्मेदार? स्टाफ जोसेफ //वर्मा की विदाई पार्टी केनाम पर ऐसा शर्म नाक कारनामा?
विस चुनाव के समय इसी शाला का शिक्षकशकरगोयल
छेड़-छाड़ की घटना में आज तक फरार? निलंबित भी नहीं हूआआज तक!
नगर में जमकर चर्चा हो रही //
शिक्षा के मंदिर में आस्था को ठेस: परशुराम जयंती और अक्षय तृतीया पर शिक्षकों ने की शराब-मटन पार्टी…
छत्तीसगढ़ मे
शिक्षा के मंदिर में आस्था को ठेस: परशुराम जयंती और अक्षय तृतीया पर शिक्षकों एक ओर जहां पूरा भारत भगवान परशुराम जयंती और अक्षय तृतीया का पर्व श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ मना रहा था, वहीं दूसरी ओर छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले से आस्था को ठेस पहुंचाने वाली घटना सामने आई है. जिले के पिथौरा नगर के शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में हिंदुओं के पावन पर्व के दिन ही स्कूल परिसर में बकरा पार्टी और ब्रांडेड शराब का सेवन किया गया.
इस घटना से हिंदू समाज के लोगों की धार्मिक भावनाएं आहत हुई हैं और स्कूल प्रशासन के लिए उनमें भारी नाराजगी देखने को मिल रही है. भारी आक्रोश है !
जानकारी के मुताबिक, स्कूल में सेवारत शिक्षिका कमलजीत जोसेफ और लिपिक तानसिंह वर्मा का विदाई समारोह आयोजित किया गया था.
इसमें शिक्षकों ने शिक्षा के मंदिर में ही पर्व के महत्व को अनदेखा करते हुए मर्यादा को भी तार-तार कर दिया. किसी भी स्कूल में जहां बच्चों को सही रास्ते पर चलने की सीख और नशे से दूर रहना सिखाया जाना चाहिए, वहां ऐसे आयोजन का होना बेहद निंदनीय है
. ऐसी घटनाएं समाज में गलत संदेश देती हैं और बच्चों के लिए भी एक खराब वातावरण निर्मित करता है.
जानिए क्या कहते हैं जिम्मेदार
प्राचार्य की बचाव करने वाली बात
इस पूरे मामले में स्कूल के प्राचार्य आशाराम बरिहा का कहना है कि त्यौहार का ख्याल नहीं रहा और अनजाने में बकरे की सब्जी बना दी गई. इसके लिए खेद है. उन्होंने स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि बकरा स्कूल परिसर में नहीं पकाया गया था, बल्कि बाहर पकाकर सब्जी को स्कूल में लाया गया था.
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जांच होगी
जिला शिक्षा अधिकारी मोहन राव सावंत *ने कहा कि इस मामले की शिकायत मिली है.
जांच के लिए कमेटी बनाई गई है, जिसमें सहायक संचालक,BEO, BRC को जांच कर रिपोर्ट सौपने का आदेश किया गया है.
दोषी पाए जाने पर कार्यवाही की जाएगी.
: ✍🏽 आज से एक दो दशक पहले कभी किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि शिक्षा के मंदिरों में ऐसे काम होंगी जिसकी कल्पना भी मुश्किल
सवाल यही है: क्या ऐसे शिक्षकों से नैतिकता की उम्मीद की जा सकती है?
बात सिर्फ एक आयोजन की नहीं है, ये उस सोच की तस्वीर है जहां शिक्षक खुद अपनी मर्यादाएं भूल बैठते हैं। बच्चों के लिए आदर्श बनने वाले शिक्षक ही जब गलत उदाहरण पेश करें, तो शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी है।
ये क्या संस्कार देंगे समाज व बच्चों को