प्रकृति की गोद में बसे ग्राम ढूंनढूंनीपानी में कमार जनजाति के लोग कर रहें जिंदगी की जद्दोजहद

विशेष पिछड़ी कमार जनजाति तक नहीं पहुंच पाई शासकीय योजनाएं

Chhattisgarh Crimes

किशन सिन्हा / छुरा

छुरा। गरियाबंद जिले के मूल निवासी माने जाने वाले व भारत सरकार द्वारा अतिपिछड़ी जनजाति का दर्जा प्राप्त वनवासी कमार जनजाति आज भी मूलरूप से बिहड़ जंगलों में निवास रत हैं सही मायने में जल-जंगल-जमीन का प्रचलित ध्येय वाक्य इन्हीं आदिवासियों पर सिरोधार्य है जो आज भी वनों में रहते हुए प्राकृतिक संसाधनों का उपयोग करते हुए अपना जीवन यापन कर रहे हैं, इनके आय का प्रमुख स्रोत वनोपज संग्रह, बांस से विभिन्न प्रकार के दैनिक उपयोग करने की सामाग्री बनाना तथा कलाकृतियों का निर्माण है।

हमारा देश भारत आज जब स्वतंत्रता के 75 वर्ष पुरे होने पर आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहा है, ऐसे में गरियाबंद जिले के सीमांत क्षेत्र में बसे छुरा विकासखंड के ग्रामपंचायत रूवाढ़ के ग्राम ढुंनढुंनीपानी का उल्लेख करना इसलिए आवश्यक हो जाता है क्योंकि कि यहां के लोगो का जीवन स्तर आज भी निम्न स्तर पर है, यहां घरों के बाहर बच्चे आधे अधुरे कपड़ों में मदमस्त खेलते नजर आ जायेंगे इन्हें आंगनबाड़ी तक पहुंचने में या एक टिकिया, बिस्किट खाने के वास्ते दो से तीन किलोमीटर की दूरी तय करना होता है, सुखे राशन व पंचायत स्तर के कार्य हेतु सड़क मार्ग से करीबन 6 से 7 किलोमीटर दूर ग्रामपंचायत रूवाढ़ का रूख़ करना होता है। साथ ही शहर से दूर होने से स्वास्थ की उत्तम व्यवस्था भी इनके लिए चुनौती पेश करता है यही कारण है कि यहां के बच्चे व बड़े बुड़े शारीरिक व मानसिक रूप से आज के जीवन शैली से काफी पीछे नजर आते हैं।

वनांचल में बसे इन आदिवासियों की बस्ती को पहली नजर में देखा जाय तो बेहद ही मनोरम प्रतीत होता है जहां चारों ओर आकर्षक पहाड़ियां हरे भरे पेड़ पौधों के बीच लकड़ियों व मिट्टी से बने कच्चे मकान हैं लेकिन परिवर्तन शील मौसम में भीषण गर्मी तेज बारिश आंधी तूफान ओलावृष्टि के स्थिति में इनका जीवन निसंदेह दूभर अवश्य होता होगा।

वहीं केन्द्र व राज्य सरकार द्वारा इन आदिवासियों के कल्याण हेतु विभिन्न योजना संचालित है जिसमें आवास की उत्तम व्यवस्था नलजल से संबंधित योजना स्वास्थ्य संबंधी योजना शिक्षा संबंधी योजना विशेष तौर पर आर्थिक उन्मूलन हेतु वनोपज खरीदी व बांस से बने वस्तुओं हेतु बनी विभिन्न योजनाओं का जमीनी स्तर पर संचालन होना इनके विकास क्रम में जुड़ने का एक अच्छा माध्यम बन सकता है।

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