raipur:ईओडब्ल्यू इस वजह से रीएजेंट घोटाले की जांच कर रही है क्योंकि स्वास्थ्य विभाग ने अनावश्यक डिमांड की और सीजीएमएससी ने भी उसकी जांच किए बिना ही करोड़ों का रीएजेंट खरीदकर सप्लाई कर दिया। इसका नतीजा ये हुआ कि पिछले साल दिसंबर से जनवरी तक करीब 30 करोड़ का रीएजेंट एक्सपायरी हो चुका है। अभी भी करोड़ों का रीएजेंट स्वास्थ्य विभाग के हेल्थ सेंटरों और सीजीएमएससी के गोदामों में पड़ा है।
प्रदेश के 350 करोड़ के रीएजेंट घोटाले में आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) के अधिकारियों ने जांच आगे बढ़ा दी है। इस क्रम में 2022-23 में स्वास्थ्य विभाग के संचालक रहे आईएएस भीम सिंह और छत्तीसगढ़ मेडिकल सर्विसेस कार्पोरेशन(सीजीएमएससी) के एमडी चंद्रकांत वर्मा से गुरुवार को ईओडब्ल्यू ने पूछताछ की। सीजीएमएससी ने जब स्वास्थ्य विभाग से एक मुश्त खरीदी के लिए कहा, तब चंद्रकांत वर्मा सीजीएमएससी में पदस्थ थे।
ईओडब्लयू के अफसरों ने दोनों आईएएस से पूछा कि उन्होंने जरूरत न होने के बावजूद कैसे इतनी बड़ी मात्रा में रीएजेंट खरीदा। स्वास्थ्य विभाग से डिमांड आने पर ही सीजीएमएससी खरीदी करती है। लेकिन जब स्वास्थ्य विभाग से एक मुश्त इतनी मात्रा में रीएजेंट खरीदी की मांग की गई तब सीजीएमएससी के अफसरों ने जानकारी तक नहीं मांगी कि आखिर एकाएक इतने रीएजेंट की मांग क्यों की जा रही है।
सीजीएमएससी में खरीदी का आर्डर एमडी के माध्यम से दिया जाता है। इसलिए तत्कालीन एमडी चंद्रकांत वर्मा भी इस मामले में जांच के घेरे में हैं। ईओडब्ल्यू के अफसरों ने इस वजह से उन्हें भी बुलाकर पूछा कि उन्होंने एक मुश्त खरीदी का आर्डर कैसे दे दिया। दोनों आईएएस अफसरों से पूछताछ के लिए ईओडब्ल्यू के अफसरों ने पिछले महीने ही शासन से अनुमति मांगी थी। शासन से अनुमति मिलने के बाद ही दोनों को नोटिस देकर बुलाया गया था।
दोनों को अलग-अलग बिठाया : टेंडर प्रक्रिया के बारे में भी पूछा रीएजेंट घोटाले की जांच कर रही ईओडब्ल्यू की ने आईएएस भीम सिंह और चंद्रकांत वर्मा दोनों को अलग-अलग बिठाकर पूछताछ की। पहले तो उनसे रीएजेंट की गैरजरूरी खरीदी के बारे में जानकारी ली गई। तत्कालीन संचालक से पूछा गया कि जब जिलों के स्वास्थ्य केंद्रों से मांग ही नहीं आई थी तो इतनी डिमांड क्यों की गई। फिर ऐसे हेल्थ सेंटरों में कैसे सप्लाई किया गया जहां न तकनीशियन हैं न पैथालॉजी लैब। सीजीएमएससी के अफसरों से पूछा गया कि जब गोदाम में स्टॉक रखने की जगह नहीं थी तब क्यों और किसके आदेश पर इतनी खरीदी गई।
उसके बाद टेंडर प्रक्रिया के बारे में सवाल जवाब किए। दरअसल 2017-18 से 2022-23 के बीच मोक्षित कंपनी को ही करोड़ों का टेंडर मिला था। मोक्षित कंपनी के डायरेक्टर शशांक चोपड़ा ने तीन फर्जी कंपनी भी कागजों में बनाई थी और उनके माध्यम से रिंग बनाकर टेंडर भरता था। ये कैसे संभव हुआ, इस बारे में भी पूछताछ की गई।