तेजी से बदलते परिस्थितियों से अंचल के अन्नदाता है परेशान

Chhattisgarh Crimes

किशन सिन्हा/ छुरा

छुरा। भारत एक कृषि प्रधान देश है जहां के ज्यादातर जनसंख्या कृषि पर ही आधारित आर्थिक क्रियाकलापों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है और इस क्रियाकलाप में छत्तीसगढ़ राज्य का अहम भूमिका है यही कारण कि छत्तीसगढ़ राज्य को धान का कटोरा कहा जाता हैं, लेकिन आज के स्थिति में उस कटोरे में को भरने वाला किसान तेज़ी से बदलते जलवायु और जमीनी स्तर पर परिवर्तनशील आर्थिक स्वरुप से हतास और नीरस नजर आते हैं। एक समय था जब ग्रामीण अंचल के किसान अपने परिवार जनों व सहयोगियों के साथ मिलकर धान की जोताई बुवाई से लेकर निराई गुड़ाई व घर में निर्मित जैविक खाद के छिड़काव से लेकर फसल की कटाई और मिसाइ का कार्य स्वयं ही किया करते थे।

यदि किसी परिवार में कृषि कार्य करने हेतु लोग कम भी होते थे तो वे अपने आस पास के समकक्क्ष परिवार के साथ कृषि कार्य हेतु सफरीया पद्धति का अनुसरन करते हुए एक-दुसरे के कार्यों में सहायता करते थें। इसी तरह बड़े कृषकों के बांस खेती तथा खेती में उपयोग के संसाधन तो स्वयं के होते थे मगर खेतिहर मजदूर द्वारा किया जाता था जिनका मेहनताना उन्हें देहाड़ी साप्ताहिक मासिक और वार्षिक जैसे अलग-अलग रूप से प्रदान किये जाता था यही कारण था कि गांवों में छोटे बड़े किसान अपने खेती हेतु स्वालबी हुआ करते थे, किन्तु आज की स्थिति में परिस्थितियों बदल गई है लोगों में अपसी सहयोग की भावना, दुसरो के खेतों में मजदूरी के प्रति उदासीनता प्रबल हो गया है। जिसके फलस्वरूप अब आधुनिक खेती में मानवीय श्रम के साथ साथ रासायनिक तथा मशीनी तकनिक का सहारा लिया जा रहा है जिसमें एक एकड़ धान की खेती में लग भाग दस हजार तक के रासायनिक खाद कीटनाशक चार से पांच हजार के खर्च से जोताई ल तीन से चार हजार के हार्वेस्टिंग में खर्च आने लगा है।

इस प्रकार के परिस्थिति में एक कृषक को खेती से लाभ के बजाय नुकसान होता हुआ अधिक प्रतित है। इसके पीछे का एक कारण हम वर्षा की अनिमित्ता को भी मन सकते है जिसे समय पर जल की आपूर्ति का न होना तथा फसल तैयार होने पर तेज हवा के संग होला वृष्टि वर्षा का होना किसानों का खेती में किये निवेश के भर पाई तक नही करने देती है।

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