जन्म से बिना मलद्वार के जी रहा मासूम, तीन साल से पेट में पाइप के सहारे जिंदगी

Chhattisgarh Crimes

इलाज के इंतजार में तड़प रहा राष्ट्रपति के दतक पुत्र खे जाने वाले कमार जनजाति का परिवार

लोकेश्वर सिन्हा. गरियाबंद जिले के आदिवासी अंचल मैनपुर से एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की संवेदनहीन तस्वीर सामने आई है। विशेष पिछड़ी कमार जनजाति से जुड़े एक परिवार का तीन वर्षीय मासूम बेटा जन्म से ही गंभीर बीमारी से जूझ रहा है। हालत यह है कि बच्चा पिछले तीन वर्षों से पेट में लगाए गए पाइप के सहारे जिंदगी जीने को मजबूर है, लेकिन आज तक उसे स्थायी उपचार नहीं मिल सका है।

मामला मैनपुर विकासखंड के बेहराडीह पंचायत अंतर्गत बोइरगांव का है, जहां रहने वाले धनेश नेताम का बेटा जन्म से ही “एनोरेक्टल मालफरमेशन” नामक गंभीर बीमारी से पीड़ित है। इस बीमारी में बच्चे का मलद्वार विकसित नहीं हो पाता, जिसके कारण सामान्य तरीके से शरीर से मल बाहर नहीं निकल पाता।

परिजनों के मुताबिक बेटे के जन्म से ही उसकी स्थिति बिगड़ने लगी जांच के बाद डॉक्टरों ने बताया कि बच्चा जन्मजात गंभीर बीमारी से पीड़ित है। जिसे तत्काल रायपुर रिफर किया गया था। तत्काल राहत के तौर पर डॉक्टरों ने बच्चे के पेट में एक पाइप लगाकर मल निकासी की व्यवस्था कर दी, लेकिन इसके बाद परिवार को न तो उचित मार्गदर्शन मिला और न ही आगे के इलाज की कोई ठोस व्यवस्था हो पाई।

गरीबी और संसाधनों की कमी से जूझ रहा यह विशेष पिछड़ी जनजातीय परिवार पिछले तीन वर्षों से बेटे को उसी हालत में पालने को मजबूर है। बच्चे की देखभाल में हर दिन भारी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। पेट में लगे पाइप के कारण संक्रमण का खतरा लगातार बना रहता है, वहीं बच्चा सामान्य बच्चों की तरह जीवन भी नहीं जी पा रहा है।

धनेश नेताम ने बताया कि उन्होंने कई बार सरकारी अस्पतालों के चक्कर लगाए, लेकिन आर्थिक स्थिति कमजोर होने के कारण बड़े अस्पतालों में इलाज करा पाना संभव नहीं हो सका। परिवार मजदूरी कर किसी तरह जीवनयापन करता है। ऐसे में लाखों रुपये के इलाज का खर्च उठा पाना उनके लिए असंभव है।

परिजनों ने प्रदेश सरकार और स्वास्थ्य विभाग से मदद की गुहार लगाई है। उनका कहना है कि यदि समय रहते बच्चे का समुचित ऑपरेशन और उपचार हो जाए तो उसका जीवन सामान्य हो सकता है। लेकिन अब तक किसी जनप्रतिनिधि या प्रशासनिक अधिकारी की ओर से ठोस पहल नहीं की गई है।

यह मामला एक बार फिर सवाल खड़े कर रहा है कि आखिर दूरस्थ वनांचल क्षेत्रों में रहने वाले विशेष पिछड़ी जनजातियों तक स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ कब पहुंचेगा। सरकार भले ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के दावे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत आज भी कई गरीब परिवारों को दर्द और बेबसी के बीच जीने को मजबूर कर रही है।