■ छत्तीसगढ़ और उड़ीसा से उमड़ा लाखों लोगों की जनसैलाब, 10 किलोमीटर तक चारो तरफ भीड़ ही भीड़ जयकारों से गूंज उठा क्षेत्र।
युमेन्द्र कश्यप/मैनपुर। प्रसिद्ध धार्मिक स्थल कांदाडोंगर पहाड़ी पर इस वर्ष भी विजयदशमी का पर्व बेहद अनूठी और प्राचीन आदिवासी परंपरा के साथ मनाया गया। इस ऐतिहासिक स्थल की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां रावण दहन नहीं किया जाता, बल्कि आदिवासी परंपरा को निभाते हुए 84 गांवों के देवी-देवताओं की भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है।
इस पावन अवसर पर छत्तीसगढ़ के अलावा पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी लाखों की संख्या में श्रद्धालु पहुंचे, जिससे पूरा क्षेत्र भक्तिमय हो उठा।
*■ मुख्य आकर्षण और पर्व की भव्यता:* 84 गांवों के देवी-देवताओं का मिलन पर विजयदशमी के पावन अवसर पर छत्तीसगढ़ और उड़ीसा सहित आसपास के 84 गांवों से माता कुलेश्वरी देवी, मां खंबेश्वरी देवी और राजा कचना धुर्वा सहित विभिन्न देवी-देवताओं की डांग, डोली और ध्वज-पताकाएं कांदाडोंगर पहाड़ी पर पहुंचीं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर झांकर बैगा, पुजारियों और सिरहाओं की अगुवाई में देवी-देवताओं ने आकर्षक नृत्य और शौर्य का प्रदर्शन किया।आदिवासी परंपरा के अनुसार विशेष पूजा-अर्चना और ‘रैनी’ मारकर दशहरा पर्व मनाया गया। इस दौरान चारों तरफ देवी-देवताओं के जयकारों की गूंज सुनाई देती रही।जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति में क्षेत्र की सुख, शांति, समृद्धि और खुशहाली की कामना के लिए बड़ी संख्या में स्थानीय जनप्रतिनिधि और गणमान्य नागरिक भी इस ऐतिहासिक आयोजन में शामिल हुए।
*■ त्रेतायुग से जुड़ी है इस अनोखे पर्व की मान्यता:*
ग्रामीणों और बुजुर्गों से मिली जानकारी के अनुसार, इस स्थल का गहरा पौराणिक महत्व है। ऐसा माना जाता है कि त्रेतायुग में भगवान श्री राम, और लक्ष्मण द्वारा माता सीता की खोज करते हुए इस कांदाडोंगर पहाड़ी पर पहुंचे थे और यहां कुछ दिनों तक विश्राम भी किया था।जब भगवान राम द्वारा रावण वध किए जाने की खबर इस क्षेत्र में पहुंची, तब आनंदित होकर 84 गांवों के देवी-देवताओं इसी पहाड़ी पर एकत्र हुए थे और विजय की खुशी में नृत्य किया था। तभी से चली आ रही परंपरा के अनुसार यहां आज भी रावण दहन के बजाय देवी-देवताओं की आराधना और उत्सव मनाने की परंपरा जीवित है।
*■ धार्मिक और पर्यटन के लिहाज से महत्वपूर्ण है कांदाडोंगर:*
मैनपुर का कांदाडोंगर अपनी प्राकृतिक सुंदरता और रहस्यों के लिए पूरे प्रदेश में प्रसिद्ध है। इस पहाड़ी के भीतर कई बड़े और प्राचीन रहस्य छिपे हुए हैं
गुप्त धार्मिक स्थल, पहाड़ी के ऊपर आदिवासियों के कई प्रमुख और गुप्त स्थल हैं, जहां समय-समय पर विशेष पूजा-अर्चना की जाती है।
मान्यताओं के अनुसार, प्राचीन काल में यहां ऋषि-मुनियों ने तपस्या की थी, और उनके यज्ञ की राख आज भी इस पहाड़ी पर मौजूद है।अनगिनत छोटी बड़ी गुफाएं और प्राकृतिक संपदा इस क्षेत्र को एक प्रमुख धार्मिक और पर्यटन केंद्र बनाती हैं। दशहरा पर्व पर लाखों श्रद्धालुओं की उपस्थिति और पारंपरिक अनुष्ठानों के साथ संपन्न हुआ यह आयोजन एक बार फिर छत्तीसगढ़ की समृद्ध आदिवासी संस्कृति और उसकी प्राचीन विरासत का अनूठा उदाहरण पेश कर गया।