
रायपुर। मानवाधिकार की बात करने वाले माओवादी खुद नाबालिगों को हथियार थमाते हैं। जबरन अपने कैडर में भर्ती करते हैं। त्योहारों को तो छोड़ दें परिवार में किसी की मौत हो जाने पर भी उन्हें घर नहीं जाने देते।
यह बात सामने आई है दंतेवाड़ा पुलिस की एक पैमाइश से। पुलिस टीम ने सन् 2012 से लेकर अब तक आत्मसमर्पण करने वाले 5 लाख रुपए तक के इनामी माओवादियों के बीच 15 अगस्त 2021 से लेकर 14 सितंबर 2021 तक एक सर्वे कराया। इसमें पूछा गया कि जब वे माओवादी संगठन में भर्ती किए गए, तब उनका पद और आयु क्या थी। अपनी मर्जी से संगठन में गए या उनके साथ कोई जबर्दस्ती की गई? किस उम्र में उन्हें हथियार दिया गया और कितने महीने के अंतराल में उन्हें घर जाने दिया गया? क्या त्यौहार के समय भी घर जाने को मिलता था?
यह भी पूछा गया कि क्या माता-पिता, भाई-बहन, पति-पत्नी या बच्चे के बीमार होने पर घर जाने दिया गया? परिवार में किसी मृत्यु पर घर जाने दिया गया? संगठन में कार्य करने के दौरान के नसबंदी कराई गई? क्या संगठन को छोडऩे की आजादी थी और क्या संगठन में तेलुगु और गैर-तेलुगू कैडर के बीच भेदभाव किया जाता था?
इस सर्वेक्षण से यह बात निकलकर आई कि संगठन में भर्ती की औसत आयु 15.2 वर्ष है। अर्थात् अधिकांश की भर्ती 18 साल से पहले नाबालिग रहने के दौरान की गई। 70 प्रतिशत से अधिक माओवादी कैडर को उनकी और उनके माता-पिता की सहमति के बगैर भर्ती की गई।
ऐसे भर्ती करने वाले माओवादियों को 17.5 साल की आयु में ही हथियार दे दिए गए। स्वचालित और अर्ध-स्वचालित हथियार 20.6 साल की उम्र में दे दिए गए। इससे मालूम हुआ कम उम्र में ही उन्हें घातक हमला करना सिखा दिया जाता है।
यह भी जानकारी मिली की 25 प्रतिशत माओवादियों को एक भी बार घर जाने नहीं दिया गया। 30 प्रतिशत में 5 साल में केवल एक बार घर का दौरा किया। त्योहारों के दौरान किसी भी माओवादी कैडर को घर जाने की अनुमति नहीं थी। परिवार के किसी सदस्य के बीमार होने पर भी किसी माओवादी कैडर को घर नहीं जाने दिया गया। अभी मालूम हुआ कि 20 प्रतिशत से भी कम माओवादी कैडर को अपने माता-पिता की मौत होने पर घर जाने की अनुमति मिली। 25 प्रतिशत माओवादी कैडर की नसबंदी उनकी सहमति के बगैर करा दी गई। इन माओवादियों को अपनी मर्जी से संगठन छोडऩे की अनुमति नहीं है। लगभग 30 प्रतिशत माओवादियों ने माना कि बस्तर के कैडर तथा तेलुगु कैडर के बीच भेदभाव किया जाता है।
दंतेवाड़ा के पुलिस अधीक्षक अभिषेक पल्लव ने बताया कि यह सर्वेक्षण खास तौर पर इस बात के लिए किया गया क्योंकि अक्सर फोर्स पर मानवाधिकार के उल्लंघन का आरोप लगता है। वस्तुस्थिति यह है कि माओवादी स्वयं अपने संगठन में भोले-भाले कम उम्र के नाबालिगों को भर्ती कर मानवाधिकार की घोर अवहेलना कर रहे हैं। कम उम्र में ही इन्हें 5 लाख रुपए का इनामी बना दिया गया। इसका मतलब यह है कि कम से कम 30 से अधिक जघन्य अपराधों में ये शामिल रहे हैं। यह सर्वेक्षण बस्तर के युवाओं को जागरूक करने और माओवादियों की असलियत को उजागर करने के लिए जरूरी था।