तीनों कृषि कानून की वापसी किसानों की बड़ी ऐतिहासिक जीत, आंदोलन में सक्रिय भूमिका में रहें विभिन्न नेताओं का मत

शिखादास की रिपोर्ट/ छत्तीसगढ़ क्राइम्स

Chhattisgarh Crimes

पिथोरा। तीनों कृषि कानून पर प्रधानमंत्री की वापसी की घोषणा के बाद हमारे रिपोर्टर ने काले तीनों कृषि कानून के विरोध में आंदोलनरत किसानों के संघर्ष में भागीदार रहें विभिन्न संस्थाओं के पदाधिकारियों नेताओं से खास बातचीत किया जिसमें उन्होने जो प्रतिक्रिया दी है हम पाठकों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं।

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क्रांतिकारी सांस्कृतिक मंच(RCF) के तुहिन देव, रवि पालूर, प्रवीण नाडकर ने अपने प्रतिक्रिया में कहा कि प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि वो तीनों काले कृषि कानून वापस लेने जा रहे हैं । ये कार्यवाही आने वाले संसद सत्र में की जाएगी । ये एक साल से सड़क पर सर्दी गर्मी की परवाह किए बिना आंदोलन कर रहे लाखों किसानों की जीत है । ये उन सभी 700 से ज़्यादा शहीद हुए किसानों की जीत है जो आंदोलन में लड़ते हुए शहीद हुए ।

ये लखीमपुर खीरी में मंत्री के बेटे द्वारा मारे गए उन किसानों और उनके परिवारों की भी जीत है । हमें याद रखना चाहिए कि इन सभी किसानों की हत्या की ज़िम्मेदार ये फासीवादी मोदी सरकार है । पिछले एक साल में इसी सरकार और इसकी पालतू मीडिया ने किसानों को खालिस्तानी, आतंकवादी , आंदोलनजीवी और न जाने का क्या क्या कहा था, इन लोगों ने यहां तक कहा कि ये लोग किसान ही नहीं हैं ! आंदोलन स्थलों पर कीलें लगाई गई , पानी की तोप और लाठीचार्ज किया गया ।उन पर केस दर्ज हुए और उन्हें कितना दमन झेलना पड़ा । लेकिन ये किसानों के आंदोलन की ही ताकत है कि उसने अहंकारी मोदी सरकार को घुटने पर ला दिया है और उन्हें मौखिक रूप से हार माननी पड़ी है ।

किसानों ने सर्दी में अपने साथियों को मरते देखा , दुनिया भर की बदनामी झेली , कितने हमले झेले , कितने आँसू बहाये लेकिन उन्होने हार नहीं मानी । ये 15 अगस्त1947 के बाद का सबसे बड़ा आंदोलन रहा है । इसकी एक बड़ी उपलब्धि ये रही है कि कॉरपोरेट पूँजीपतियों की तानाशाही का पर्दाफाश किया है। मोदी सरकार सिर्फ दूसरी बार अपने निर्णय से पीछे हटी है ये किसानों और आम जनता की ताक़त नहीं तो और क्या है ? वहीं दुसरी और भारतीए जनजागरण मंच रायगढ़ के संयोजक राधेश्याम शर्मा ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि तीनों कृषि कानून असंवैधानिक तौर पर पारित किया गया था भाजपा का बहुमत राज्यसभा में नहीं था इसलिए वहां मतदान नहीं कराया गया ।

बहुमत के आधार पर जबरदस्ती किसानों के ऊपर यह तीनों कृषि काले कानून थोप दिए गए जिसके चलते किसानों को आंदोलित होना पड़ा, इस आंदोलन में 700 से भी अधिक किसान साथी शहीद हुए। आजादी के बाद देश का सबसे बड़ा जन आंदोलन के रूप में यह किसान आंदोलन उभरा और सरकार को घुटने के बल ला खड़ा किया। इस आंदोलन को जीत कर किसानों ने एक नया इतिहास लिखा है।