
पूरन मेश्राम/मैनपुर। एक तरफ सरकार शिक्षा के स्तर को ऊंचा उठाने के बड़े-बड़े दावे करती है, तो दूसरी तरफ गरियाबंद जिले के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र के जमीनी हकीकत कुछ और ही है। विकासखंड मैनपुर की ग्राम पंचायत भूतबेड़ा के आश्रित ग्राम मोतीपानी में वर्षो से स्कूली बच्चे गाय के कोठा और खपरैल वाली जर्जर मकान में पढ़ाई करने को मजबूर हैं।
4 साल से अधूरा पड़ा है स्कूल भवन
ग्रामीणों ने बताया कि ग्राम मोतीपानी में शासकीय प्राथमिक शाला भवन का निर्माण 4 वर्ष पूर्व शुरू हुआ था, लेकिन ठेकेदार द्वारा उसे आधा-अधूरा छोड़कर भाग गया। तब से आज तक वह भवन अधूरा पड़ा हुआ है। ग्रामीण मुखियाओ के द्वारा शासन-प्रशासन को कई बार आवेदन, निवेदन और पत्राचार करने के बावजूद कोई सुनवाई नहीं हुई, न ही अधूरा छोड़ने वाले ठेकेदार पर कोई कार्यवाही हुई।
गिर ना जाए कोठा, इसलिए ग्रामीण कर रहे श्रमदान
मजबूरी में बरसात के दिनों में कहीं कोठा वाली स्कूल गिर ना जाए, इसलिए गांव के ग्रामीणों ने स्वयं श्रमदान कर खपरैल वाले कोठा की मरम्मत की है, ताकि बच्चे सुरक्षित रह सकें। सोचिए, जहां बच्चों के हाथ में किताब-कॉपी होनी चाहिए, वहां उनके माता-पिता टांगी-फावड़ा लेकर स्कूल की छत ठीक कर रहे हैं।
आदिवासी बच्चों का भविष्य अंधकार में
आदिवासी बाहुल्य राजा पड़ाव क्षेत्र की स्कूलों की हालत बद से बदतर हो गई है। कोई पेड़ के नीचे, तो कोई कोठा में पढ़ने को मजबूर है। बरसात में टपकती छत, गर्मी में तपता खपरैल और ठंड में ठिठुरते बच्चे – इसी में शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं मोतीपानी के मासूम।
ग्रामीणों का सवाल है कि जब चुनाव आता है तो बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव बाद सब भूल जाते हैं। क्या राजापड़ाव क्षेत्र के बच्चों को अच्छी शिक्षा का अधिकार नहीं है। क्या सरकार सिर्फ कागजों में ही स्कूल बनाएगी। क्या मोतीपानी के बच्चों की हालत सुधारने की कोई पहल सरकार करेगी।
यह खबर शासन-प्रशासन की लापरवाही और शिक्षा विभाग की उदासीनता को उजागर करती है।