
हथौड़े की ठक-ठक के बीच तैयार हो रहा था फर्नीचर
मौके पर पहुंचने पर भारी-भरकम पुरानी सागौन की लकड़ी, फर्नीचर बनाने के औजार, मशीनें और बुरादा दिखाई दिया। वहां दो बढ़ई फर्नीचर निर्माण में जुटे थे। जानकारी के मुताबिक, दोनों कारीगर देवभोग क्षेत्र से बुलाए गए थे। मौके पर मौजूद बढ़ई नरेश नागेश ने बताया कि उन्हें एक विभागीय कर्मचारी के कहने पर फर्नीचर बनाने के लिए बुलाया गया था।
दरवाजे-चौखट की मरम्मत या राजशाही डाइनिंग टेबल-कुर्सियों का निर्माण?
इस संबंध में रेंजर सुशील कुमार सागर ने बताया कि कार्यालय के टूटे दरवाजे और चौखट की मरम्मत के लिए लकड़ी से संबंधित काम कराया जा रहा था। लेकिन मौके पर दो डाइनिंग टेबल और आठ कुर्सियां तैयार किए जाने की जानकारी सामने आने से कई सवाल खड़े हो रहे हैं।
यदि काम केवल मरम्मत का था, तो फर्नीचर निर्माण किस योजना के तहत कराया जा रहा था? क्या इसके लिए लिखित आदेश, स्वीकृति और लकड़ी के आवंटन से संबंधित दस्तावेज मौजूद हैं? इन सवालों का जवाब विभागीय रिकॉर्ड की जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा।
लकड़ी जब्त थी या विभागीय उपयोग के लिए जारी की गई थी?
वन विभाग अवैध कटाई और लकड़ी की तस्करी रोकने के लिए कार्रवाई करता है। ऐसे में विभागीय परिसर में लकड़ी से फर्नीचर बनाए जाने के मामले में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है।
उप निदेशक बोले—जांच के बाद ही बता पाऊंगा
मामले में उदंती-सीतानदी टाइगर रिजर्व के उप निदेशक वरुण कुमार जैन ने कहा कि सभी तथ्यों की जांच करने के बाद ही बताया जा सकेगा कि सागौन की लकड़ी से कार्यालय के लिए क्या बनवाया जा रहा था और क्या यह मरम्मत का काम था।
अब निगाहें विभागीय जांच पर टिकी हैं। जांच में निर्माण के आदेश, लकड़ी के स्रोत, सरकारी रिकॉर्ड और तैयार हो रहे फर्नीचर के उपयोग की स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि आम ग्रामीण के पास इतनी सागौन की लकड़ी मिलती, तो क्या उससे भी इसी तरह दस्तावेजों की जांच होने तक इंतजार किया जाता? फिलहाल किसी अनियमितता की पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभागीय परिसर में सामने आए इस मामले में निष्पक्ष जांच जरूरी है।
यदि काम नियमों के तहत हुआ है, तो दस्तावेजों से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। वहीं, नियमों का उल्लंघन मिलने पर जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।