छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में पति को ‘भिखारी’ कहना मानसिक क्रूरता माना

Chhattisgarh Crimesछत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद में पति को ‘भिखारी’ कहना मानसिक क्रूरता माना है। जस्टिस पार्थ प्रतिम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच ने जगदलपुर फैमिली कोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। साथ ही, पति की अपील स्वीकार करते हुए उसे तलाक की मंजूरी दे दी।

पति ने आरोप लगाया था कि पत्नी उसके साथ गाली-गलौज और मारपीट करती थी। कम कमाई पर उसे भिखारी कहकर अपमानित करती थी। उसके चरित्र पर शक करती थी और मां से अलग रहने का दबाव बनाती थी। वहीं, पत्नी ने आरोपों को नकारते हुए पति और उसके परिवार पर दुर्व्यवहार का आरोप लगाया था।

मामले में पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(क) के तहत पत्नी से तलाक मांगा था। हालांकि, फैमिली कोर्ट ने 10 दिसंबर 2022 को उसकी याचिका खारिज कर दी थी। इसके बाद पति ने फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

कम आमदनी पर ताने, चरित्र पर संदेह करने का आरोप

जगदलपुर का रहने वाला पति बिजली मैकेनिक है। उसकी शादी 2017 में हुई ​थी। पति का आरोप था कि पत्नी उसके साथ गाली-गलौज और मारपीट करती थी। वह कम कमाई को लेकर ताने मारती थी और उसे भिखारी कहकर अपमानित करती थी।

पति के मुताबिक, पत्नी उसके चरित्र पर शक करती थी और उसे अपनी मां से अलग रहने के लिए दबाव डालती थी। इन सब वजहों से उनके वैवाहिक जीवन में लगातार तनाव बना रहता था। वहीं, पत्नी ने इन आरोपों को गलत बताया। पति और उसके परिवार पर दुर्व्यवहार करने का आरोप लगाया था।

हर झगड़ा क्रूरता नहीं, लेकिन व्यवहार का समग्र प्रभाव जरूरी

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के गवाहों के बयान और सबूतों की जांच की। डिवीजन बेंच ने कहा कि गर्भपात, आत्महत्या की धमकी और अन्य निजी आरोपों के पर्याप्त सबूत नहीं होने के कारण इसे क्रूरता का आधार नहीं माना जा सकता।

हालांकि, गवाहों के बयानों से यह साफ हुआ कि पति-पत्नी के बीच लगातार झगड़े होते थे, एक-दूसरे पर भरोसे की कमी थी और परिवार के सदस्यों के साथ संबंध अच्छे नहीं थे। साथ ही, साथ रहने के तरीके को लेकर भी उनके बीच बार-बार विवाद होता था।

हाईकोर्ट ने कहा कि पति-पत्नी के बीच हर झगड़े या मतभेद को क्रूरता नहीं माना जा सकता। इसके लिए उनके पूरे वैवाहिक जीवन और एक-दूसरे के साथ व्यवहार को देखना जरूरी है। इस मामले में लगातार विवादों से पति को हुई मानसिक परेशानी सामान्य वैवाहिक अनबन से ज्यादा थी।

फैमिली कोर्ट के फैसले में खामी, पति को मिली राहत

हाईकोर्ट ने कहा कि फैमिली कोर्ट सभी सबूतों को मिलाकर सही तरीके से उनका आकलन नहीं कर पाया था। इसी वजह से हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और मानसिक क्रूरता के आधार पर पति को तलाक की मंजूरी दे दी।

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