छत्तीसगढ़ के चर्चित नान घोटाले से जुड़ी जनहित याचिकाओं के साथ ही अपील को हाईकोर्ट ने निराकृत और खारिज कर दी

Chhattisgarh Crimesछत्तीसगढ़ के चर्चित नान घोटाले से जुड़ी जनहित याचिकाओं के साथ ही अपील को हाईकोर्ट ने निराकृत और खारिज कर दी है। वहीं, सीबीआई जांच की मांग को भी ठुकरा दिया है। डिवीजन बेंच ने स्पष्ट कहा कि मामला अब ट्रायल के अंतिम चरण में है, ऐसे में जांच एजेंसी बदलने का कोई औचित्य नहीं है। हाईकोर्ट ने जिन लोगों पर एसीबी ने चालान नहीं किया है, उनके खिलाफ ट्रायल कोर्ट में आवेदन लगाने की छूट दी है।

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस प्रार्थ प्रतीम साहू की डिवीजन बेंच में नान घोटाले से जुड़ी 8 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई की। इनमें से कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन होने के कारण सालों से लंबित थीं। सितंबर में सुप्रीम कोर्ट ने मामलों का निराकरण कर दिया था, इसके बाद हाईकोर्ट ने शुक्रवार को सुनवाई तय की थी।

8 याचिकाओं पर केवल दो की तरफ से आए वकील

चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच में शुक्रवार को सुनवाई के दौरान केवल दो याचिकाकर्ता हमर संगवारी एनजीओ और अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ही उपस्थित हुए। अन्य याचिकाकर्ता या उनके वकील अनुपस्थित रहे, जिसके चलते हाईकोर्ट ने उन याचिकाओं को खारिज कर दिया। वहीं, भाजपा नेता धरमलाल कौशिक की ओर से अधिवक्ता गैरी मुखोपाध्याय उपस्थित हुए, जिन्होंने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे हाईकोर्ट ने मंजूर कर लिया है।

224 में से 170 गवाहों के बयान हो चुके

राज्य सरकार की ओर से दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अतुल झा ने बताया कि ट्रायल कोर्ट में अब तक 224 में से 170 गवाहों के बयान दर्ज हो चुके हैं। अब मामला अंतिम चरण में है।

जानिए क्या है नान घोटाला?

नान यानी नागरिक आपूर्ति निगम पर आधारित यह घोटाला छत्तीसगढ़ की सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) में हुई बड़ी अनियमितताओं से जुड़ा है। राज्य में 2011 की जनगणना के अनुसार 55 लाख परिवार थे, लेकिन 70 लाख राशन कार्ड बनाए गए। करोड़ों रुपs के चावल, दाल, नमक और अन्य खाद्य सामग्री की आपूर्ति में व्यापक घोटाला हुआ।

घटिया गुणवत्ता का नमक, जिसमें जांच के दौरान कांच के टुकड़े तक पाए गए, आदिवासी इलाकों में वितरित किया गया। नान के 27 जिला प्रबंधक, क्षेत्रीय अधिकारी और मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारी इस रैकेट से जुड़े बताए गए। इसके बावजूद एसीबी ने कई जिला प्रबंधकों को अभियुक्त नहीं बनाया, जबकि छापों के दौरान अवैध लेन-देन के प्रमाण मिले थे।

एसीबी-ईओडब्ल्यू ने की थी छापेमारी

2015 में एसीबी और ईओडब्ल्यू ने कार्यालयों और अधिकारियों के घरों पर छापेमारी थी। आरोप है कि जांच के बाद भी मुख्य अभियुक्तों को तत्काल गिरफ्तार नहीं किया गया और राजनीतिक दबाव में केस को कमजोर किया गया। 2018 में कांग्रेस सरकार बनने के बाद एसआईटी का गठन हुआ। उस समय के नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक ने एसआईटी जांच के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर कर दी।

बाद में भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष विक्रम उसेंडी ने भी सीबीआई जांच का विरोध करते हुए आवेदन दिया। साल 2017, 2019 और 2021 में इस पर लंबी सुनवाई हुई, लेकिन निर्णय नहीं आ सका। इसी दौरान ईडी (प्रवर्तन निदेशालय) ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की, जिसके बाद हाईकोर्ट की कार्रवाई पर रोक लग गई। अब सुप्रीम कोर्ट में ईडी की याचिकाओं के निराकरण के बाद हाईकोर्ट में लंबित याचिकाओं की सुनवाई की गई।

 

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