
समिति के सदस्यों ने बताया कि मंदिर स्थल में बिजली कनेक्शन के लिए विद्युत विभाग में आवेदन किया गया है। वन विभाग द्वारा भी कनेक्शन ले जाने के लिए जगह देने की अनुमति भी दे दी है। लेकिन, मंदिर गांव से 2 किलोमीटर दूर होने के कारण बजट बढ़ गया है। जिसके कारण मंदिर समिति द्वारा सौर ऊर्जा से पानी सहित लाइट का व्यवस्था की गई है। समिति के संरक्षक दिलीप साहू, अध्यक्ष चम्मन साहू, उपाध्यक्ष ओंकार साहू, सचिव अनिल साहू, दीपक ध्रुव, शंकर साहू, पुनु निषाद, उगेश साहू ने बताया कि घटारानी, जतमई, निरई, गरजई आदि 21 बहनों में से एक बहन माता झरझरा को माना जाता है। जंगल के बीच विराजित माता झरझरा का पता 1987 में चला, तब से यहां ग्रामीण दोनों नवरात्रि में ज्योत जलाते आ रहे हैं। लेकिन जंगल के वादियों में स्थित माता झरझरा के स्थल का अब तक कोई विकास नहीं हुआ है। अगर, इस स्थल का भी क्षेत्र के घटारानी व जतमई की तरह विकास हो जाता है तो यह स्थल भी दार्शनिक व पर्यटक स्थल के रूप में उभर सकता है।
झरझरा विकास समिति के पुजारी गोवर्धन यादव, जीवन साहू, हेमलाल साहू, कन्हैया ध्रुव ने बताया कि सर्वप्रथम सन 1987 में ग्राम मुरमुरा निवासी गैंदराम साहू को माता ने जंगल के डोंगरी में अपनी मौजूद होने का आभास कराया था। जिस पर गैंदराम साहू ने ग्राम मुरमुरा व फुलझर के कुछ लोगों को सहयोग में लेकर घनघोर वीरान जंगल में झरझरा माता के स्थल पर पहली बार ज्योत प्रज्वलित किया था। जिसके बाद से मुरमुरा सहित फुलझर व धुरसा के ग्रामीण आस्था की ज्योत जलाते आ रहे हैं। पहले की अपेक्षा इस वर्ष झरझरा माता का दर्शन करने श्रद्धालुओं की संख्या में इजाफा हुआ है। बताया जाता है कि माता झरझरा के साथ माता जतमई भी इसी जगह पर निवास करती थी। लेकिन, लकड़ी बिनने जंगल गई महिलाओं की मासिक अशुद्धता के कारण माता जतमई इस जगह को छोडक़र गायडबरी व कोसमपानी के बीच स्थित पहाड़ी में जाकर विराजमान हो गई। झरझरा स्थल में माता जतमई के जाने का पद चिन्ह स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।