
भगवान दास ने बताया कि उनकी तीन पीढ़ियां ग्राम झारा में निवास कर रही हैं। इसके बावजूद, तहसील कार्यालय ने उनका आवेदन यह कहकर अस्वीकृत कर दिया कि सर्वे-सेटलमेंट उपलब्ध नहीं है। उन्होंने अपनी परेशानी बताते हुए कहा कि वे प्रमाण पत्र के लिए तहसील, पटवारी और अन्य कार्यालयों के बीच भटक रहे हैं।
जाति प्रमाण पत्र न मिलने से परिवार को नहीं मिल पा रहा शासकीय लाभ
जाति प्रमाण पत्र न मिलने का सीधा असर उनके परिवार पर पड़ रहा है। उनके चार बेटों को अनुसूचित जनजाति होने के बावजूद कोई भी शासकीय लाभ नहीं मिल सका है। अब यह समस्या अगली पीढ़ी तक पहुंच गई है, क्योंकि उनके पोते को कॉलेज में पढ़ाई के दौरान छात्रवृत्ति, आरक्षण या अन्य शैक्षणिक सुविधाओं का लाभ नहीं मिल पा रहा है।
जाति प्रमाण पत्र के अभाव में कई आदिवासी परिवार परेशान
भगवान दास के अनुसार, यह समस्या केवल उनकी नहीं है। ग्राम झारा सहित आसपास के कई गांवों में अनेक आदिवासी परिवार इसी तरह जाति प्रमाण पत्र के अभाव में परेशान हैं। वर्षों से निवास, सामाजिक पहचान और परंपरागत जातीय स्थिति होने के बावजूद प्रमाण पत्र न मिलने से शासन की आदिवासी कल्याणकारी योजनाएं केवल कागजों तक ही सीमित रह गई हैं।
स्थानीय ग्रामीणों ने बताया कि प्रशासन द्वारा तकनीकी आधारों पर आवेदन निरस्त कर दिए जाते हैं, लेकिन इन समस्याओं के स्थायी समाधान के लिए कोई ठोस पहल नहीं की जा रही है। इससे आदिवासी समुदाय में गहरा असंतोष और निराशा व्याप्त है। ग्रामीणों का सवाल है कि केवल सर्वे-सेटलमेंट के अभाव में जाति प्रमाण पत्र से वंचित रखना कितना न्यायसंगत है।
एसडीएम आनंद नेताम ने कहा कि दूसरे राज्यों से भी आकर छत्तीसगढ़ सरहद क्षेत्र में लोग रहते हैं। नियमानुसार यदि दस्तावेज उपलब्ध कराया जाएगा तो जाति प्रमाण बनाने में कोई दिक्कत नहीं होगी।