छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बैजनाथ पारा स्थित आर्य समाज मंदिर प्रेम करने वालों के लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं

Chhattisgarh Crimesछत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में बैजनाथ पारा स्थित आर्य समाज मंदिर प्रेम करने वालों के लिए किसी तीर्थ स्थल से कम नहीं है। यहां हर साल हजारों शादियां होती है। यहां आने वाले जोड़े अपने चाहने वाले का साथ और जीवन भर हाथों में हाथ की चाहत लेकर आते हैं।

मंदिर प्रधान के मुताबिक, 1907 में जब स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय रायपुर आए थे, उसी दौरान इस मंदिर की स्थापना हुई। उस समय रायपुर सेंट्रल प्रोविंसेस और बरार का हिस्सा था। बरार ब्रिटिश काल से पहले और दौरान एक ऐतिहासिक क्षेत्र का नाम था। यह आज के महाराष्ट्र के विदर्भ क्षेत्र जैसे अमरावती, अकोला, बुलढाणा आदि में आता था। आज यह मंदिर करीब 119 साल पुराना हो चुका है।

हर साल करीब 1100 शादियां

अंग्रेजों के दौर से लेकर अब तक यहां 34 हजार से ज्यादा प्रेमी जोड़ों की शादी हो चुकी है। हर साल यहां 1000 से 1100 शादियां होती हैं। वैलेंटाइन डे के आसपास विवाह करने वाले जोड़ों की संख्या और बढ़ जाती हैं।

परिवार के विरोध के बावजूद विवाह संपन्न

कई बार प्रेमी जोड़े घरवालों से छिपकर विवाह करने आते हैं। जैसे ही परिवार को जानकारी मिलती है, वे विरोध करने पहुंच जाते हैं। कई बार पुलिस की मौजूदगी में भी विवाह संपन्न कराया गया। मंदिर प्रबंधन का कहना है कि जोड़ा मंदिर की चौखट तक पहुंचता है, तो वैदिक रीति से विवाह कराने की पूरी कोशिश की जाती है।

वैदिक विचारधारा और अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा

आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में की थी। यह संस्था जात-पात और भेदभाव को नकारते हुए अंतरजातीय विवाह और सामाजिक एकता को बढ़ावा देती है। यही वजह है कि यहां प्रेम विवाह करने वाले जोड़ों की संख्या लगातार बढ़ रही है।

विधि-विधान के साथ सुरक्षित विवाह

मंदिर समाज की बंदिशों से परेशान प्रेमियों के लिए सुरक्षित ठिकाना है। यहां विवाह पूरी कानूनी प्रक्रिया और वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न होता है। शादी के लिए वर-वधू की न्यूनतम उम्र 21 साल (वर) और 18 साल (वधू) निर्धारित है।

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