
गृह मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर के मुख्य न्यायाधीश और राज्य सरकार से परामर्श के बाद यह निर्णय लिया गया है। विशेष अदालत का अधिकार क्षेत्र बस्तर संभाग के जिलों तक रहेगा। जिसमें दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा, कोंडागांव और उत्तर बस्तर कांकेर सहित अन्य जिले शामिल हैं।
लंबे समय से थी जरूरत
बस्तर क्षेत्र में नक्सल हिंसा से जुड़े कई बड़े और संवेदनशील मामले वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया में लंबित हैं। इनमें झीरम घाटी हमला, दंतेवाड़ा में भीमा मंडावी की हत्या और नारायणपुर सहित अन्य जिलों में हुई कई राजनीतिक और नक्सली घटनाएं शामिल हैं। इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए NIA ने विशेष अदालत की मांग की थी।
बस्तर संभाग में नक्सल मामलों की सुनवाई को गति देने के लिए केंद्र सरकार ने जगदलपुर में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) की विशेष अदालत स्थापित कर दी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय की तरफ से जारी अधिसूचना के अनुसार, जगदलपुर स्थित नामित अपर सत्र न्यायालय को NIA विशेष न्यायालय के रूप में अधिसूचित किया गया है। जिसमें केवल NIA के जांच के मामलों की सुनवाई होगी।
गृह मंत्रालय की अधिसूचना के मुताबिक, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर के मुख्य न्यायाधीश और राज्य सरकार से परामर्श के बाद यह निर्णय लिया गया है। विशेष अदालत का अधिकार क्षेत्र बस्तर संभाग के जिलों तक रहेगा। जिसमें दक्षिण बस्तर दंतेवाड़ा, कोंडागांव और उत्तर बस्तर कांकेर सहित अन्य जिले शामिल हैं।
लंबे समय से थी जरूरत
बस्तर क्षेत्र में नक्सल हिंसा से जुड़े कई बड़े और संवेदनशील मामले वर्षों से न्यायिक प्रक्रिया में लंबित हैं। इनमें झीरम घाटी हमला, दंतेवाड़ा में भीमा मंडावी की हत्या और नारायणपुर सहित अन्य जिलों में हुई कई राजनीतिक और नक्सली घटनाएं शामिल हैं। इन मामलों की गंभीरता को देखते हुए NIA ने विशेष अदालत की मांग की थी।
स्थानीय स्तर पर होगी सुनवाई
अब तक NIA से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए पक्षकारों और जांच एजेंसी को अन्य स्थानों पर निर्भर रहना पड़ता था। जगदलपुर में विशेष अदालत बनने से सुनवाई स्थानीय स्तर पर हो सकेगी, जिससे मामलों के निपटारे में तेजी आने की उम्मीद है। साथ ही गवाहों की पेशी, दस्तावेजों की उपलब्धता और न्यायिक प्रक्रिया को भी सुविधा मिलेगी।
न्यायिक प्रक्रिया होगी मजबूत
विशेष अदालत के गठन को बस्तर में कानून-व्यवस्था और न्यायिक ढांचे को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से जुड़े गंभीर मामलों की सुनवाई अब अधिक प्रभावी और त्वरित ढंग से हो सकेगी, जिससे लंबे समय से लंबित मामलों के जल्द निपटारे की संभावना बढ़ गई है।