
प्रतिष्ठा और करियर को नुकसान पहुंचाना भी मानिसक क्रूरता की श्रेणी में आता है। कोर्ट ने इस टिप्पणी के साथ पत्नी को पति से तलाक का हकदार माना है। कोर्ट ने पत्नी की अपील मंजूर करते हुए दुर्ग फैमिली कोर्ट के आदेश को निरस्त कर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि जब शादी केवल विवाद, तनाव और मुकदमेबाजी का कारण बन जाए तो उसे बनाए रखना दोनों पक्षों के हित में नहीं होता।
ससुराल वालों पर प्रताड़ना का आरोप
दरअसल, दुर्ग जिला निवासी पति-पत्नी का विवाह 30 मार्च 2019 को भिलाई के पंचशील नगर में हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। पत्नी का आरोप है कि शादी के बाद पति और ससुराल वाले दहेज की मांग को लेकर उसे मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे।
पति ने उसके मायके वालों से एक लाख रुपए की डिमांड की, जिसे पत्नी ने अपनी नौकरी से किस्तों में दिया। इसके बाद भी उसका पति उसके साथ दुर्व्यवहार कर मानसिक रूप से प्रताड़ित करता रहा।
तंग आकर मायके में रहने लगी पत्नी
महिला ने कोर्ट को बताया कि वह लगातार प्रताड़ना से तंग आकर मई 2020 में पति को छोड़कर अपने मायका चली गई। उसने सितंबर 2020 में पति को कानूनी नोटिस भेजकर स्त्रीधन लौटाने और अलग रहकर जीवन बिताने की इच्छा जताई, लेकिन पति ने न तो नोटिस का जवाब दिया और न ही उसे वापस लाने का कोई प्रयास किया।
इसके बाद दुर्ग के फैमिली कोर्ट में पत्नी ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 के तहत तलाक की अर्जी लगाई। सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट ने साल 2022 में पर्याप्त सबूत नहीं होने का हवाला देते हुए पत्नी की तलाक की अर्जी को खारिज कर दी।
फैमिली कोर्ट के बाद हाईकोर्ट में अपील
फैमिली कोर्ट के इस आदेश के खिलाफ पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील की। सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों के बयान और रिकॉर्ड देखा। जिसमें पाया कि पति ने खुद स्वीकार किया कि उसने पत्नी को वापस बुलाने का कोई प्रयास नहीं किया और पत्नी द्वारा भेजे गए नोटिस को फाड़ दिया था।
‘जीवनसाथी के करियर-प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाना वैवाहिक क्रूरता’
जस्टिस रजनी दुबे और जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की डिवीजन बेंच ने अलग-अलग मामलों में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि क्रूरता केवल शारीरिक हिंसा तक सीमित नहीं है।
मानसिक उत्पीड़न, उपेक्षा, असहयोग और ऐसा व्यवहार जिससे जीवनसाथी के स्वास्थ्य, करियर और मानसिक संतुलन पर विपरीत असर पड़े, उसे भी वैवाहिक क्रूरता माना जाएगा।
हाईकोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि जब विवाह केवल विवाद, तनाव और मुकदमेबाजी का कारण बन जाए तो उसे बनाए रखना दोनों पक्षों के हित में नहीं होता। ऐसे मामलों में सम्मान और भविष्य को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।