संदर्भ: राजापड़ाव क्षेत्र की समस्या के लिए आंदोलित ग्रामीणों के मोर्चा खोले जाने के बाद जागा प्रशासन, क्या समस्याओं के निदान के लिए आंदोलन करने पर ही सुध लेगा प्रशासन !

Chhattisgarh Crimes

पूरन मेश्राम/ छत्तीसगढ़ क्राइम्स

मैनपुर। ब्लाक के सुदूर वनांचल क्षेत्र राजापड़ाव क्षेत्र के 65 पारा टोला गांव के ग्रामीण जो वर्षो से मूलभूत सुविधाओं के आभाव में बद से बत्तर जिंदगी जीते जब थक हार गए तब अपने मूलभूत अधिकारों को पाने के लिए उन्होंने संघर्ष करने का मन बनाया और संगठित होकर 28 मार्च को अनिश्चितकालीन नेशनल हाईवे पर चक्का जाम करने की जब दहाड़ लगाई तो इसका असर ऐसा था कि जो प्रशासन कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ था वह खड़ा हुआ।

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ग्रामीणों के आक्रोश को प्रशासन भांप गया और समस्याओं के निवारण के लिए बैठकों का दौर भी शुरु हो गया, जो काम ठंडे बस्ते में थे उन्हें जमीन पर आकार भी दिया जाने लगा, जिस अस्पताल में वर्षो से डॉक्टर झांकने की जहमत नहीं उठा रहे थे आंदोलन के डर से आनन फानन में चिकित्सक की व्यवस्था भी कर दी है। ग्रामीण तय कार्यक्रम के अनुसार आज जब नेशनल हाईवे पर चक्काजाम करने सैकड़ों की संख्या में आए तो वहां पहले से मौजूद आला अफसरों ने ग्रामीणों को भरोसा दिलाया कि जिलाधीश नम्रता गांधी ग्रामीणों की मूलभूत समस्याओं के लिए काफी गंभीर है और ग्रामीणों की समस्याओं के निदान की दिशा में उनके द्वारा कार्यवाही प्रारंभ कर दिया गया है।

आला अधिकारियों की बात सुनकर आंदोलन पर उतारू ग्रामीण समस्याओं का ज्ञापन सौंपकर इस उम्मीद से अपने गांव वापस चले गए की जब जिलाधीश महोदया ने हमारी मूलभूत मांगो को गंभीरता से लिया है तो निदान भी अवश्य होगा। ग्रामीणों का भरोसा जिलाधीश महोदया के ऊपर हैं । अब देखना यह है कि क्या सच में राजापड़ाव क्षेत्र के इलाके की तस्वीर बदलेगी या फिर ग्रामीणों को वहीं जिंदगी जीनी पड़ेगी जिससे थक हार कर आंदोलन की राह अपनाई थी।

बहरहाल आंदोलन की आग भड़कने से पहले ही प्रशासनिक सुझबुझ से शांत हो जरूर गई है पर इस घटना ने बरबस ही उस बात की और हमारा ध्यान आकर्षित करा दिया है कि क्या ग्रामीणों को अपने मूलभूत अधिकारों के लिए संघर्ष करने के बाद ही बिजली पानी सड़क की सुविधा मिलेगी उससे पहले नही यह सोचनीय विषय? संविधान में हर नागरिक को मूलभूत सुविधाएं मिले इसका प्रावधान किया गया है पर इसके बावजूद ग्रामीणों को अपने मूलभूत सुविधाओं के लिए आंदोलन का रूख अख्तियार करना पढ़ रहा है और जैसे ही आंदोलन की सुगबुगाहट शुरू होती हैं प्रशासन आंदोलनकारियों से मिलकर समस्याओं के निदान की दिशा में पहल प्रारंभ कर देता हैं,इस बात से ऐसा लगता कि अगर ग्रामीण अपने अधिकार के लिए आंदोलन ना करें तो उन्हें मूलभूत अधिकार भी नहीं मिलेगा! अगर प्रशासनिक अधिकारी और मैदानी कर्मचारी ग्रामीणों की समस्याओं के प्रति संजीदगी के साथ काम कर उन्हें वह सुविधा मुहैया करा दे जिसके वें अधिकारी हैं तो शायद ही प्रशासन को कभी अप्रिय स्थिति का सामना करना न पड़े।

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