
निजी अस्पतालों में आर्थिक रूप से सक्षम लोग डिलीवरी कराते हैं, जिनकी फिजिकल एक्टीविटीज कम होती है। ऐसे में नॉर्मल के बजाय सीजेरियन डिलीवरी कराई जाती है। ये कहना है कि कुछ डॉक्टरों का, जो सीजेरियन डिलीवरी के पक्ष में तर्क देते हैं। ये सही है कि पहले की तुलना में महिलाओं की फिजिकल एक्टीविटीज कम हुई है, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है। सरकारी अस्पतालों में केवल गरीब व कुछ मध्यम वर्ग की महिलाओं की डिलीवरी कराने तर्क ये डॉक्टर देते हैं। इसलिए सरकारी अस्पतालों में कम सीजेरियन डिलीवरी होती है।
केस-एक
राजधानी के एक निजी अस्पताल में 27 वर्षीय महिला की सीजेरियन डिलीवरी की गई। पहले कहा गया कि इंश्योरेंस पॉलिसी में 50 हजार के पैकेज में हो जाएगी। बाद में अन्य खर्च के नाम पर 22 हजार कैश लिया गया। कुल 72 हजार खर्च में ऑपरेशन कर प्रसव कराया गया।केस-दो
23 वर्षीय महिला को निजी अस्पताल की डॉक्टर ने पहले सामान्य प्रसव होने की जानकारी दी थी। फिर 15 दिनों पहले सीजेरियन डिलीवरी कराई गई, ये कहकर कि सामान्य प्रसव में खतरा हो
प्रदेश में दो साल के आंकड़े इस तरह
सरकारी व निजी अस्पतालों में डिलीवरी
2020-21 2021-22
16.31 17.82
सरकारी अस्पतालों में डिलीवरी
06.67 07.27
ये निजी अस्पतालों में डिलीवरी
47.73 50.87
अन्य राज्यों में छत्तीसगढ़ से कम
राज्य 2020-21 2021-22
गुजरात 21.68 20.62
महाराष्ट्र 26.54 30.96
आंध्रप्रदेश 47.69 47.52
कर्नाटक 44.4 44.11अन्य राज्यों में छत्तीसगढ़ से ज्यादा
राज्य 2020-21 2021-22
जम्मू-कश्मीर 89.43 91.74
दिल्ली 59.47 61.61
गोवा 58.9 61.68
ओडिशा 64.67 74.62
निजी अस्पतालों के आंकड़े प्रतिशत में…
आर्थिक रूप से सक्षम घरों की महिलाएं, जो लेबर पेन सहन नहीं कर सकती, उनके परिजन ऑन डिमांड सीजेरियन डिलीवरी कराना चाहते हैं। अगर प्राइवेट में पहली डिलीवरी सीजेरियन हुई है तो दूसरा भी सीजेरियन होती है।
जबकि सरकारी अस्पतालों में पहली डिलीवरी सीजेरियन होने के बाद भी नार्मल कराने की कोशिश की जाती है। प्राइवेट में संपन्न लोग जाते हैं इसलिए सीजेरियन डिलीवरी का परसेंटेज ज्यादा है।