
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने 23 मार्च को फांसी के फंदे को चूमा था. हम बात करेंगे 28 सितंबर 1907 जन्मे भगत सिंह की ज़िंदगी के उस पहलू पर, जो हमेशा से ही लोगों के बीच कौतूहल का विषय रहा है. भगत सिंह क्या थे? उनकी आस्था क्या थी? नास्तिक? आस्तिक? सिख? हिंदू? या फिर एक आर्यसमाजी?
शहीद-ए-आज़म भगत सिंह ने 27 सितंबर 1931 को जेल में रहते हुए एक लेख लिखा था. लेख का शीर्षक था ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ इस लेख को लाहौर के जाने-माने अखबार ‘द पीपल’ ने प्रकाशित किया था. इस लेख में भगत सिंह ने ईश्वर के अस्तित्व पर अनेक तर्कपूर्ण सवाल खड़े किए हैं. संसार के निर्माण, इंसान के जन्म, लोगों के मन में ईश्वर की कल्पना, संसार में इंसान की लाचारगी, शोषण, दुनिया में मौजूद अराजकता और भेदभाव की स्थितियों का भी विश्लेषण किया है.
इस लेख को भगत सिंह के लेखन के सबसे चर्चित और प्रभावशाली हिस्सों में गिना जाता है. इसका कई बार प्रकाशन भी हो चुका है.
‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ लिखने के पीछे का किस्सा
‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ लेख लिखने के पीछे एक दिलचस्प किस्सा है. कहते हैं जब आज़ादी के सिपाही बाबा रणधीर सिंह को ये बात पता चली कि भगत सिंह को ईश्वर में यकीन नहीं है, तो वो किसी तरह जेल में भगत सिंह से मिलने उनके सेल पहुंच गए. जहां भगत सिंह को रखा गया था. रणधीर सिंह भी साल 1930-31 के दौरान लाहौर के सेंट्रल जेल में बंद थे.
तब भगत सिंह पर लगा ये आरोप
वे बेहद धार्मिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति थे. उन्होंने भगत सिंह से ईश्वर के अस्तित्व को मानने के लिए कहा. उसके लिए उन्होंने तमाम तर्क दिए. यकीन दिलाने की खूब सारी कोशिश की. लेकिन इतनी मेहनत के बाद भी वो कामयाब नहीं हो सके. अपने मकसद में मिली नाकामयाब से नाराज होकर बाबा रणधीर ने भगत सिंह से कहा कि ये सब तुम मशहूर होने के लिए कर रहे हो. तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है. तुम अहंकारी बन गए हो. मशहूर होने का लोभ ही काले पर्दे की तरह तुम्हारे और ईश्वर के बीच खड़ा हो गया है.
रणधीर सिंह के आरोपों का जवाब भगत सिंह ने उस समय तो नहीं दिया, लेकिन कुछ दिनों बाद जवाब में उन्होंने एक लेख लिखा, और यही लेख था ‘मैं नास्तिक क्यों हूं?’ के नाम का. जो आज की तारीख़ में भी बेहद प्रासंगिक है.