छत्तीसगढ़ राज्य गठन के 25 साल बाद भी साल 1979 से 2001 के बीच पास हुए 10वीं-12वीं के छात्रों के अंकपत्रों (मार्कशीट) में सुधार के लिए राज्य आज भी मध्य प्रदेश पर निर्भर है। छत्तीसगढ़ माध्यमिक शिक्षा मंडल (माशिमं) के पास ‘कोरी स्टेशनरी’ (ब्लैंक मार्कशीट) न होने से नाम और स्पेलिंग की गलतियां सुधारने के 351 मामले पिछले 6 महीने से फाइलों में कैद हैं।
चौंकाने वाली बात यह है कि छत्तीसगढ़ द्वारा लगातार मांग किए जाने के बावजूद मध्य प्रदेश बोर्ड न तो कोरी स्टेशनरी दे रहा है और न ही इसे खुद छापने की अनापत्ति दे रहा है।
राज्य गठन से पहले परीक्षा पास करने वाले सैकड़ों छात्रों के लिए अंकपत्रों की ये मामूली गलतियां अब नौकरी, दस्तावेज सत्यापन (डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन) और उच्च शिक्षा में प्रवेश के दौरान बड़ी रुकावट बन गई हैं। हालांकि, छत्तीसगढ़ माशिमं ने इन 351 मामलों में रिकॉर्ड के स्तर पर सुधार तो कर लिया है, लेकिन कोरी स्टेशनरी न होने की वजह से वे छात्रों को संशोधित डुप्लीकेट अंकसूची जारी नहीं कर पा रहे हैं।
पत्र लिखा, जवाब नहीं आया तो अफसर भी भेजा: मामले को सुलझाने के लिए छत्तीसगढ़ माशिमं ने मध्य प्रदेश बोर्ड को दर्जनों पत्र लिखे, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। आवेदनों के बढ़ते दबाव को देखकर छत्तीसगढ़ से एक अधिकारी को भोपाल भी भेजा गया। वह अधिकारी दो-तीन दिन तक वहां डटा रहा, फिर भी खाली हाथ लौटना पड़ा।