
गोबर वाले हनुमान जी का मंदिर काफी प्रचीन है। तपस्वी बाबा रुख्खड़ नाथ गिरी महाराज जिन्हें श्रीरुख्खड़ स्वामी महाराज के नाम से जाना जाता है, उन्होंने ही हनुमान जी की प्रतिमा गाय के गोबर से बनाई थी। तब से इसे गोबर वाले हनुमान जी के नाम से जाना जाता है।
वास्तविक रूप से बाबा रुख्खड़ नाथ महाराज के आश्रम में विराजमान यह प्रतिमा पश्चिममुखी हनुमान मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। इस मंदिर में 350 सालों से अग्निकुंड की अग्नि जल रही है।
गोबर वाले हनुमान जी का यह मंदिर लगभग 350 साल से भी अधिक पुराना है। यह दुर्ग जिला अंतर्गत भिलाई के जामुल थाना क्षेत्र में नारधा गांव में स्थित है। यह प्रतिमा अभी भी सुरक्षित है और रुख्खड़ नाथ स्वामी के वंशज सुरेंद्र गिरी महाराज इनकी पूजा करते हैं।खैरागढ़ को गढ़ का रूप मिला
सुरेंद्र गिरी महाराज ने इस मंदिर के बारे में बताया कि रुख्खड़ स्वामी पंचदशनाम जूना अखाड़ा काशी वाराणसी से अपने शिष्य मौनीगिरी, दत्त गिरी और दौलत गिरी के साथ आए और यहीं बैठकर तपस्या करने लगे।
उस समय खैरागढ़ और नागपुर के राजा इनसे मिलने के लिए आते थे। इसलिए इस जगह को गढ़ का रूप दिया गया। रुख्खड़ नाथ ने बाबा ने खैरागढ़ को भी बसाया है।तिजरा ज्वर को कंबल में उतार कर बाबा ने रख लिया था
उन्होंने बताया कि एक बार खैरागढ़ के महाराज रुख्खड़नाथ बाबा से मिलने के लिए आए थे। उस समय उन्हें तिजरा नाम का बुखार था। इस पर बाबा ने एक कंबल मांगा और उसमें तिजरा ज्वर को उतार कर रख दिया और राजा से दरबार करने लगे।
जब राजा ने पूछा कि उनका कंबल कांप क्यों रहा है, तो बाबा ने बताया कि इस कंबल में तिजरा नाम के ज्वर को रखे हैं, आपसे चर्चा के बाद इसे फिर से धारण कर लेंगे। इसके बाद राजा उनके भक्त हो गए।350 साल से जल रही है पवित्र अग्नि
सुरेंद्र गिरि महाराज ने आश्रम में एक ऐसा अग्निकुंड दिखाया जो लगभग 350 साल से लगातार जल रही है। इस अग्नि को बाबा रुख्खड़ महराज ने जलाया था और तब से इसमें लगातार लकड़ी रखी जाती है और यह अग्नि कभी नहीं बुझी। इस कुंड की भभूत को यहां प्रसाद के रूप में भक्तों को दिया जाता है।पुत्रहीन को होती है संतान की प्राप्ति
बाबा रुख्खड़नाथ महाराज के आश्रम के बारे में कहा जाता है कि जो व्यक्ति यहां सच्चे मन से कुछ मांगने पहुंचता है और बाबा व बजरंगबली के चरणों में माथा टेकता है उसकी इच्छा पूर्ति होती है। निसंतान दंपति को संतान तक की प्राप्ति हो जाती है।पवित्र कुंड के पानी से बनवाया पकवान
राजा की सेना और उनके लोगों को खाना खिलाने के लिए बाबा अपने शिष्यों से बोल दिया, लेकिन उनके पास पूड़ी छानने के लिए घी नहीं था। इस पर बाबा ने आश्रम के कुंड से जल निकाला और कड़ाही में डाल दिया।
कड़ाही में पड़ते ही पानी घी के रूप में परिवर्तित हो गया। यह कुंड आज भी आश्रम में स्थित है और इसका पानी इतना पवित्र है कि इससे स्नान करने से कुष्ठ रोग भी ठीक हो जाता है।खैरागढ़ को भी बसाया रुख्खड़ नाथ बाबा
रुक्खड़ नाथ बाबा इतने सिद्ध थे कि जब उन्होंने नारधा में अपने यहां आश्रम में समाधि ले ली तो वो सीधे खैरागढ़ में प्रगट हुए। उन्होंने खैरागढ़ के महाराज से मिलने के लिए संदेश भिजवाया तो महाराज ने कहा कोई ढोंगी बाबा आया होगा। उन्होंने सैनिकों से एक लोहे का सब्बल भेजकर संदेश दिया की राजा नहीं मिल सकते हैं।
संदेश मिलने पर बाबा वहां से जाने लगे और उन्होंने राजा के भेजे सब्बल को खैरागढ़ की भूमि में गाड़ा तो राजा पीड़ा से व्याकुल हो उठे। इसके बाद राजा वहां से परिवार के साथ भागते हुए आए और देखा कि रुख्खड़नाथ बाबा उनके गढ़ में आए हैं। राजा ने पूछा कि महाराज आपने तो समाधि ले ली थी, फिर यहां कैसे। इस पर बाबा ने कहा ये शिव महिमा है।
इसके बाद बाबा ने अपने पास जल रही अग्नि से कुछ राख उठाई और पांच कदम आगे चलकर उस राख को डाला तो वो बड़े से अग्निकुंड में बदल गया। बाबा ने राजा से कहा कि जब तक यहां रहेगी मेरी मढ़ी तब तक रहेगी तेरी ये गढ़ी। इसके बाद बाबा वहां से अंतरध्यान हो गए।