गौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले के 1998 बैच के शिक्षकों ने टीईटी परीक्षा अनिवार्य करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राहत मांगी

Chhattisgarh Crimesगौरेला-पेंड्रा-मरवाही (GPM) जिले के 1998 बैच के शिक्षकों ने टीईटी परीक्षा अनिवार्य करने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से राहत मांगी है। शिक्षकों ने इस फैसले के खिलाफ अंतरिम आवेदन दायर किया है। अधिवक्ता विशाल अरुण मिश्रा के जरिए उन्होंने मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली तीन जजों की पीठ के सामने अपना पक्ष रखा।

याचिकाकर्ता शिक्षकों का कहना है कि वे पिछले 28 साल से सरकारी सेवा में हैं। इनमें पेंड्रा विकासखंड के एलबी संवर्ग के प्रशांत शर्मा, सेमलाल साहू, गीताराम साहू, सुरेश राठौर, गणेश यादव और रजनी कोरी शामिल हैं।

इन शिक्षकों की भर्ती 1998 में मध्यप्रदेश शासन ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर शिक्षा कर्मी पदों के लिए की थी। भर्ती राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद (NCTE) अधिनियम, 1993 के नियमों के तहत हुई थी।

इस आवेदन में छत्तीसगढ़ के बम्हनीडीह, भानुप्रतापपुर, कांकेर, बस्तर, मोहला-मानपुर और नारायणपुर के शिक्षक भी शामिल हैं। इनके अलावा दूसरे राज्यों के शिक्षकों ने भी याचिका दायर की है।

8 सितंबर के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश से जुड़ा है विवाद

सुप्रीम कोर्ट की मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने राजेश चौहान विरुद्ध भारत संघ जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान 8 सितंबर को निर्देश जारी किया था।

इसमें कहा गया था कि अगले आदेश तक स्कूलों या कॉलेजों में किसी शिक्षक को नियुक्त या समाहित नहीं किया जाएगा, जब तक उसके पास संबंधित कानूनों के तहत तय योग्यता नहीं हो।

इस निर्देश में निशुल्क और अनिवार्य बाल शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009, राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 के तहत तय योग्यताओं का जिक्र किया गया था।

शिक्षकों का कहना है कि उनकी भर्ती शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम, 2009 लागू होने से पहले हुई थी। उनकी नियुक्ति उस समय राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद अधिनियम, 1993 के तहत तय मापदंडों के आधार पर की गई थी। ऐसे में उन पर टीईटी पास करने की अनिवार्यता लागू नहीं होनी चाहिए।

2017 में RTE एक्ट में संशोधन बना विवाद की वजह

शिक्षकों के मुताबिक, केंद्र सरकार ने 17 अक्टूबर 2017 को RTE एक्ट में संशोधन किया था। इसी संशोधन को वे टीईटी अनिवार्यता से जुड़ी समस्या की वजह मान रहे हैं।

संशोधन के राजपत्र में कहा गया है कि 31 मार्च 2015 तक नियुक्त या पदासीन ऐसे शिक्षक, जिन्होंने निर्धारित न्यूनतम योग्यताएं हासिल नहीं की हैं, उन्हें संशोधन लागू होने की तारीख से चार साल के भीतर ये योग्यताएं प्राप्त करनी होंगी।

केंद्र सरकार के जवाब पर टिकी नजरें

शिक्षकों ने भारत सरकार से अपील की है कि टीईटी की अधिसूचना जारी होने से पहले भर्ती हुए शिक्षकों को राहत दी जाए। उनका तर्क है कि उनकी नियुक्ति उस समय सरकार की ओर से तय योग्यता के आधार पर हुई थी। इसलिए उसी पद पर नौकरी जारी रखने के लिए उन पर नई योग्यता लागू नहीं की जानी चाहिए।

शिक्षकों ने आवेदन में यह भी कहा है कि सुप्रीम कोर्ट पहले कई मामलों में स्पष्ट कर चुका है कि भर्ती के नियम भविष्य में होने वाली भर्तियों पर लागू होते हैं। ऐसे में भारत सरकार की ओर से अंतरिम आवेदन पर पेश किया जाने वाला जवाब अहम होगा।

शिक्षकों का कहना है कि नई योग्यता लागू होने से पहले से नियमित सरकारी सेवा में काम कर रहे कर्मचारियों के बीच नौकरी की सुरक्षा को लेकर असमंजस और असुरक्षा की स्थिति बन रही है।