दिवाली पर घरों को सजाने के लिए बाजार में कई तरह की चीजें मिलती हैं, लेकिन छत्तीसगढ़ की एक पुरानी ग्रामीण परंपरा आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है। यह परंपरा धान की बालियों से झालर बनाने और उसे घर में लटकाने की है।
इसे ‘चिरई चुगनी’ कहा जाता है। धान की बालियों से तैयार इस झालर को पक्षियों के लिए रखा जाता है। पूजा करने के बाद इसे घर में लटकाने की परंपरा है। यह परंपरा खेती-किसानी और प्रकृति से जुड़ाव को भी दर्शाती है।
पहले गांवों में किसान परिवार धान की बालियों से खुद ही झालर तैयार करते थे। दिवाली के मौके पर परिवार के सभी लोग मिलकर इसे बनाते थे। इसके बाद पूजा करके घरों में लटकाटते थे।
समय के साथ सजावट के कई नए विकल्प बाजार में आ गए, लेकिन धान की बालियों से बनी चिरई चुगनी की मांग अब भी बनी हुई है। दिवाली के दौरान शहर के बाजारों में भी ये झालर बिक रही हैं। लोग इन्हें घर की सजावट के साथ पुरानी परंपरा को निभाने के लिए खरीद रहे हैं
20 साल से झालर बेचने आ रहीं पवनिया बाई
बाजार में धान की बालियों से बने झालर लेकर पहुंचीं पवनिया बाई ने बताया कि वे पिछले करीब 20 सालों से दिवाली के समय यहां इन्हें बेचने आ रही हैं। उनके परिवार के लोग मिलकर इन झालरों को तैयार करते हैं।