हेमचंद यादव विश्वविद्यालय दुर्ग में करीब 18.87 लाख रुपए की नई कार खरीदी पर ऑडिट ने गंभीर आपत्ति जताई है। छत्तीसगढ़ राज्य संपरीक्षा की जांच में वाहन खरीदी प्रक्रिया में 5 प्रमुख अनियमितताएं सामने आई हैं। विश्वविद्यालय ने वित्त विभाग की पूर्व अनुमति के बिना वाहन खरीदा। इतना ही नहीं, निर्धारित वित्तीय सीमा से करीब तीन गुना अधिक राशि खर्च की गई।
ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, 18 लाख 87 हजार 956 रुपए की वाहन खरीदी को वित्तीय नियमों और भंडार क्रय नियमों के विपरीत बताया गया है। रिपोर्ट में संबंधित जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों से अनियमित रूप से खर्च राशि की वसूली की अनुशंसा भी की गई है। जानिए ऑडिट में किन गड़बड़ियों को बताया गया।
पहली गड़बड़ी- वित्त विभाग से नहीं ली मंजूरी
ऑडिट में कहा गया है कि, वाहन खरीदने से पहले छत्तीसगढ़ शासन के वित्त विभाग से स्वीकृति नहीं ली गई। शासन के निर्देशों के अनुसार नए वाहन की खरीदी के लिए वित्त विभाग से स्वीकृति जरूरी है। ऑडिट ने बिना अनुमति किए गए इस खर्च को वित्तीय संहिता के विपरीत माना है। साथ ही जिम्मेदारी तय किए जाने की बात कही है।
दूसरी गड़बड़ी- किसके उपयोग के लिए कार, यह भी स्पष्ट नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक, उच्च शिक्षा संचालनालय से भी वाहन के इस्तेमाल की स्वीकृति नहीं ली गई। यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि नई कार का इस्तेमाल किस अधिकारी या किस काम के लिए किया जाएगा।
ऑडिट ने इसे वित्त विभाग के निर्देशों का उल्लंघन बताया है। नियमों के मुताबिक वाहन खरीदी का प्रस्ताव भेजते समय वाहन की पात्रता, पहले से उपलब्ध वाहनों और पात्र अधिकारियों की संख्या जैसी जानकारी देना जरूरी है।
तीसरी गड़बड़ी- 6.50 से 7.50 लाख की सीमा, खरीदी 18.87 लाख की
ऑडिट की सबसे बड़ी आपत्तियों में वाहन की कीमत भी शामिल है। वित्त विभाग के निर्देशों के मुताबिक पात्रता के आधार पर वाहनों के लिए 6.50 लाख और 7.50 लाख रुपए तक की वित्तीय सीमा निर्धारित की गई थी।
इसके बावजूद विश्वविद्यालय ने 18.87 लाख रुपए का वाहन खरीदा। ऑडिट ने इसे निर्धारित सीमा से करीब तीन गुना अधिक खर्च बताते हुए वित्तीय अनियमितता की श्रेणी में रखा है।
चौथी गड़बड़ी- रद्दी बेचकर मिली रकम से खरीदी कार
ऑडिट रिपोर्ट में उल्लेख है कि वाहन खरीदने के लिए रद्दी सामग्री की बिक्री से प्राप्त आय का इस्तेमाल किया गया। रिपोर्ट के मुताबिक रद्दी से मिलने वाली आय को सामान्य निधि यानी जनरल फंड में जमा किया जाना चाहिए।
ऑडिट का कहना है कि इस राशि को बिना निर्धारित पूंजीगत व्यय योजना में शामिल किए वाहन खरीदी में खर्च किया गया। इसे वित्तीय पारदर्शिता और नियंत्रण के सिद्धांतों के विपरीत माना गया है।
पांचवीं गड़बड़ी- खुली निविदा नहीं, क्रय समिति की अनुशंसा भी नहीं
वाहन खरीदी के लिए काइजन टोयोटा ऑटोमोबाइल्स, रिंग रोड सरोना रायपुर को भाव पत्र भेजा गया था। ऑडिट के अनुसार भंडार क्रय नियम 2002 के तहत 3 लाख रुपए से अधिक की खरीदी में खुली निविदा प्रक्रिया अपनाई जानी थी।
इसके अलावा 50 हजार रुपए से अधिक की खरीदी में क्रय समिति की अनुशंसा जरूरी थी। ऑडिट में कहा गया है कि इन नियमों की भी उपेक्षा की गई। इससे खरीदी में पर्याप्त प्रतिस्पर्धा और तुलनात्मक प्रक्रिया का अभाव रहा।
ऑडिट की अनुशंसा- जिम्मेदारों से राशि वसूलें
ऑडिट ने माना कि कार्यपरिषद की स्वीकृति के आधार पर वाहन खरीदी प्रशासनिक रूप से आंशिक अनुमोदन जैसी प्रतीत होती है, लेकिन वित्त विभाग की अनुमति नहीं होने के कारण खर्च नियमों के विपरीत है। राज्य संपरीक्षा ने इसे अनियमित व्यय की श्रेणी में रखने और जिम्मेदार अधिकारी-कर्मचारियों से खर्च की गई राशि की वसूली की अनुशंसा की है।
साथ ही विश्वविद्यालय को भविष्य में सभी खरीदी प्रक्रियाएं वित्तीय और भंडार क्रय नियमों के अनुसार करने के निर्देश जारी करने की बात कही है।
जिम्मेदारों ने नहीं दिया कोई जवाब
इस मामले में जब दुर्ग विश्वविद्यालय के जिम्मेदारों से जवाब मांगा गया तो सभी ने इसे दूसरे अधिकारियों पर डाल दिया। विवि प्रबंधन के मुताबिक यह पूर्व कुलपति के कार्यकाल की खरीदी हुई थी। दुर्ग विवि में फिलहाल नए कुलपति आ गए हैं। विवि प्रबंधन के अनुसार ऑडिट रिपोर्ट की जानकारी है, लेकिन इस संबंध में अभी किसी भी तरह का कोई अधिकारिक बयान नहीं देना चाह रहा है।