
ह स्थिति तब है जब पिछले महीने उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि राज्य की जांच एजेंसियां केंद्रीय अधिकारियों के खिलाफ भी कार्रवाई कर सकती हैं।
तत्कालीन एसडीएम फरार
इस घोटाले के दौरान संबंधित जिलों में पदस्थ एनएचएआइ अधिकारियों की भूमिका और जिम्मेदारियों पर सवाल उठ रहे हैं। जांच में 25 से अधिक प्रशासनिक अधिकारियों और जमीन दलालों के नाम सामने आए हैं, जिनकी गिरफ्तारी की संभावना जताई जा रही है।
रायपुर-विशाखापत्तनम कॉरिडोर मुआवजा घोटाले में मुख्य आरोपित तत्कालीन एसडीएम निर्भय कुमार साहू फिलहाल फरार हैं। वहीं नायब तहसीलदार लखेश्वर प्रसाद किरण, तहसीलदार शशिकांत कुर्रे और अन्य पटवारी तथा दलालों को गिरफ्तार किया जा चुका है।
11 जिलों में फैला मामला
राष्ट्रीय राजमार्ग (एनएचएआइ) के लिए भूमि अधिग्रहण के नाम पर हुए इस करोड़ों रुपये के घोटाले ने प्रशासनिक हलकों में खलबली मचा दी है। आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (ईओडब्ल्यू) और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की संयुक्त सक्रियता के बाद जांच का दायरा प्रदेश के 11 जिलों, रायपुर, धमतरी, कांकेर, कोरबा, दुर्ग, बिलासपुर, जशपुर, राजनांदगांव आदि तक फैल गया है।
प्रारंभिक जांच में फर्जी नामांतरण, संदिग्ध बंटवारा और पूर्व तिथि में दस्तावेज तैयार करने के प्रमाण मिले हैं, जिससे सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाने की बात सामने आई है।
बटांकन के नाम पर घोटाला
ईओडब्ल्यू की जांच के अनुसार पूरा घोटाला भूमि के बटांकन के नाम पर किया गया। परियोजना के अंतर्गत आने वाली भूमि को अधिग्रहित करते समय राजस्व अधिकारियों ने रसूखदार जमीन दलालों के साथ मिलकर एक ही खसरे की भूमि को कागजों पर अलग-अलग हिस्सों में दर्शाया।
इस प्रक्रिया के जरिए एक ही भूमि पर कई बार मुआवजा लिया गया या दरें बढ़ाकर शासन को आर्थिक नुकसान पहुंचाया गया। इस खेल में रसूखदारों और अधिकारियों ने मिलकर करोड़ों रुपये की काली कमाई की।
25 अफसरों की हो सकती है गिरफ्तारी
जांच एजेंसी ने संकेत दिए हैं कि इस घोटाले में शामिल 25 से अधिक राजस्व और प्रशासनिक अधिकारियों की जल्द गिरफ्तारी हो सकती है। ईओडब्ल्यू ने उन अधिकारियों और रसूखदारों की सूची तैयार कर ली है, जिन्होंने भ्रष्टाचार के जरिए 500 करोड़ से अधिक की संपत्ति अर्जित की है।
शासन के खजाने को नुकसान पहुंचाने वालों की चल-अचल संपत्तियों को कुर्क करने की प्रक्रिया भी जल्द शुरू की जाएगी।
इस तरह किया घोटाला
घोटालेबाजों ने मुआवजा नियमों में हेरफेर के लिए मास्टरप्लान तैयार किया। ग्रामीण क्षेत्रों में 500 वर्गमीटर से कम भूमि पर मुआवजा दर अधिक होती है। सिंडिकेट ने बड़ी जमीनों को कागजों पर छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दिया।
उदाहरण के तौर पर जिस एक एकड़ जमीन का मुआवजा 20 लाख होना था, उसे कृत्रिम विभाजन दिखाकर करोड़ों रुपये तक पहुंचा दिया गया। वर्तमान में 500 से अधिक खसरे जांच के दायरे में हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रवर्तन निदेशालय ने भी कार्रवाई शुरू कर दी है। शिकायतकर्ताओं से जुड़े करीब दो हजार पन्नों के दस्तावेज जब्त किए गए हैं।