
कोर्ट ने यह भी कहा कि अलग-अलग चरणों में अलग वकीलों को नियुक्त कर बार-बार याचिकाएं दायर करना बार की स्वस्थ परंपरा के खिलाफ है। इन टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता पर 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया।
दरअसल, याचिकाकर्ता संजीव कुमार यादव के खिलाफ विभागीय जांच हुई थी। जांच में दोषी पाए जाने पर उसकी चार वेतनवृद्धियां रोकने की सजा दी गई थी। इस फैसले के खिलाफ संजीव कुमार यादव ने पहले हाईकोर्ट की सिंगल बेंच में याचिका दायर की थी, लेकिन जनवरी 2025 में वह याचिका खारिज कर दी गई।
इसके बाद उन्होंने हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच में रिट अपील दाखिल की, लेकिन मार्च 2025 में वह भी खारिज हो गई। इस फैसले के खिलाफ याचिकाकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचे और विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दायर की, लेकिन अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने भी इसे खारिज कर दिया। इसके बाद याचिकाकर्ता ने एक बार फिर हाईकोर्ट में रिव्यू याचिका दाखिल कर दी।
एसएलपी खारिज होने के बाद राहत नहीं
हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद साफ कहा कि जब सुप्रीम कोर्ट से एसएलपी खारिज हो चुकी है, तो तथ्यों के आधार पर रिव्यू याचिका का कोई ठोस कारण नहीं बनता। कोर्ट ने बताया कि जिस तथ्यात्मक गलती की बात याचिकाकर्ता ने कही है, वह रिकॉर्ड से साबित नहीं होती।
डिवीजन बेंच ने कहा कि यह याचिका कोर्ट का कीमती समय नष्ट करने वाली है। हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील की ओर से बिना शर्त माफी मांगने पर हाईकोर्ट ने दो लाख के बजाए 50 हजार रुपए का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने आदेश दिया कि यह राशि सरकारी विशेषीकृत दत्तक ग्रहण एजेंसी, गरियाबंद को दी जाएगी। अगर याचिकाकर्ता एक महीने के भीतर यह रकम जमा नहीं करता है, तो इसे भू-राजस्व की तरह वसूला जाएगा।
हाईकोर्ट ने की सख्त टिप्पणी
हाईकोर्ट ने साफ कहा कि रिव्यू पिटीशन को अपील की तरह इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। इसे तभी स्वीकार्य है, जब रिकॉर्ड में कोई साफ और स्पष्ट गलती हो। कोर्ट ने यह भी बताया कि इस मामले में सिंगल बेंच, डिवीजन बेंच और रिव्यू पिटीशन के दौरान अलग-अलग वकील किए गए थे।
जिस वकील ने रिट अपील पर बहस की थी, उसने रिव्यू पिटीशन दायर नहीं की। यह प्रवृत्ति सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों के अनुसार निंदनीय है। डिवीजन बेंच ने तमिलनाडु इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड बनाम एन. राजू रेड्डियार सहित कई सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि वकील बदलकर रिव्यू पिटीशन दायर करना न्यायिक अनुशासन के विपरीत है।
हाईकोर्ट ने लिखा हेड-नोट
फैसले के हेड-नोट में हाईकोर्ट ने दो टूक कहा कि, बिना स्पष्ट त्रुटि के वकील बदलकर रिव्यू पिटीशन दायर करना बार की स्वस्थ परंपरा के अनुकूल नहीं है। रिव्यू के नाम पर पहले से तय मामले को दोबारा बहस के लिए खोलने की अनुमति नहीं दी जा सकती। इस फैसले के जरिए हाईकोर्ट ने न केवल समीक्षा याचिकाओं की सीमाएं दोहराई, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग पर सख्त संदेश भी दिया है।