
प्रदेश के सबसे बड़े अस्पताल व आई सेंटर आंबेडकर में सालभर से आई (आंख) काउंसलर नहीं है। काउंसलर वार्ड में भर्ती मरीजों के अलावा फील्ड में जाकर लोगों को नेत्रदान के लिए जागरूक करता है। जो काउंसलर था, उन्होंने नौकरी छोड़ दी थी। इसके बाद नई भर्ती नहीं की जा सकी है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि नेत्रदान को लेकर अस्पताल या शासन कितना गंभीर है।
नेत्रदान में कई भ्रांतियां आड़े आ रही हैं। पत्रिका की पड़ताल में पता चला है कि लोगों को जागरूक करने के लिए स्कूली बच्चों के बीच अभियान चलाया गया। आंबेडकर अस्पताल की ओर से तेलीबांधा तालाब व नर्सिंग कॉलेज की छात्राओं को नेत्रदान के लिए प्रेरित किया गया। विशेषज्ञों के अनुसार विभिन्न समाज के बीच अभियान चलाकर नेत्रदान को बढ़ाया जा सकता है। 2020 में केंद्र सरकार ने संकल्प पत्र की अनिवार्यता खत्म कर दिया था। ऐसे में कोई भी नेत्रदान कर सकता है।
किसी मृत व्यक्ति की आंख 6 घंटे के भीतर निकालना अनिवार्य है। वहीं इसे 72 घंटे के भीतर ट्रांसप्लांट करना अनिवार्य नहीं है। एडवांस आई बैंक के कारण अब हफ्तेभर के भीतर कार्निया ट्रांसप्लांट किया जा सकता है। हालांकि अब ऐसे मीडिया (कैमिकल) आ गए हैं, जिसके कारण आंख को 7 से 10 दिनों तक सुरक्षित रखा जा सकता है। आंबेडकर में ऐसी व्यवस्था है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि अच्छा रिजल्ट देना है तो आंख को निकालने के बाद जितनी जल्दी कार्निया ट्रांसप्लांट कर दिया जाए, उतना ही अच्छा होता है।