
पूरन मेश्राम/गरियाबंद। गरियाबंद जिला विकासखंड मुख्यालय मैनपुर के ग्राम पंचायत जांगड़ा कूरुभाँठा मे आज 5 मई रविवार को माटी देव घर में माटी जात्रा, पुजई एवं सिंगासेन माटी महतारी का सेवा अर्जी कार्य सम्पन्न हुआ जिसमे क्षेत्र भर के सगा समाज के सैकडो़ लोग शामिल रहे।

तत्पश्चात देव घर मे आदिवासी परम्परानुसार सूअर, बकरा,भेड़ मुर्गा का पूजवन कार्यक्रम किया गया। कृषि कार्य के शुरुआत किये जाने गांँव के माटी झांँकर के हाथ से धान बीज ग्रामीणों को दिया गया।धान बीज को तृतीया के दिन किसान अपने-अपने खेतों में बुआई का शुरुआत करेंगे।

माटी जात्रा कार्यक्रम के संबंध में जानकारी देते हुए आदिवासी संस्कृति के जानकार टीकम नागवंशी ने बताया कि
यह जात्रा कार्यक्रम मोहन जोदड़ो हड्डपा कालीन के पूर्व से वैधानिक है।हमारे पांच खंड धरती के राजा चार चौरासी 88 शंभू मुला,पांच खंड धरती के 18 गुरु पहांदी पारी कुपार लिंगों ने आदि मानव से लेकर कृषि युग का शुरुआत इस धरती मे हमारे मूल निवासियों के पुर्वजो ने ही व्यवस्था बनाया है।
यह जात्रा कार्यक्रम मूल निवासियों के ग्रामो में प्रति वर्ष गाँव गाँव में माटी जात्रा कार्यक्रम जोर शोर से मनाया जाता है। माटी जात्रा मनाने का परंम्परा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही हैं। इस सृष्टि शक्ति धरती मां के कोख से जन्मे आदि मानव याने हमारे पूर्वजो ने लाखो वर्षों पहले कच्चा फल फूल, कच्चा मांँस खाये और जंगल पहाड़ के गुफाओं में रह कर वंशज का विस्तार करते हुए सुखी लकड़ी से आंँग पैदा कर जीवन काल का शुभांरम्भ किये और घास फूस का झोपड़ी बनाकर रहने लगे।
पहले आदिम काल में जल जंगल जमीन कंद मूल फल मांस आदि जीवन का साधन रहा करता था। मिट्टी का हंँडी,पत्थर से लोहा कपास से कपड़ा का अविष्कार कर जीवन जीने लगे इसके साथ ही वन्य जीव जैसे गाय, बैल, भैस, भैसा,कुत्ता,बिल्ली,सूअर मुर्गा,मुर्गी,बदख,भेड़,उँट,हाथी, गदहा इस प्रकार के जीव जन्तु को काबू कर घरेलू जानवर बनाए तब तक इस धरती मां के गोद में नैसर्गिक रूप से धान गेहूं चना अरहर एवं अन्य साग सब्जी प्रकृति के अनुसार होता था।
मानव जीवन में विकास के गति से अचल जीव,चल जीव का बीज खत्म होने लगे तब हमारे पांच खंड धरती के राजा शंभू 18,गुरुओ ने मिल कर कृषि युग का निर्माण कराया गया तब से अब तक झूम खेती करने का प्रचार प्रसार हुआ और जितने भी अन्न होता है उसकी पांच खंड धरती पर कृषि करने हेतु प्रचार प्रसार कर पूर्वजो ने माटी जात्रा पूजई करने का नियम बनाया गया है।माटी जात्रा के दिन गांव में अपने अपने काम धंधा को बंद कर गांव के सभी लोग माटी घर देव गुड़ी में जाते है तथा सार्वजनिक रूप से मिलकर बरार बोड़ी
(सार्वजनिक रूप से सहयोग) करके बकरा,मुर्गा, सूअर,बदख भेड़,नारियल इत्यादि सामान जुगाड़ कर माटी देवी,भंडारीन देवी, अन्न कुवारी देवी, गांव के गढ़ देवी को अर्जी बिनती कर सेवा गोगो करते हैं। तत्पश्चाप पूजई करने के बाद माटी झांँकर पुजारी धरती माता के गोद में तीन पसर धान बीज डाला जाता है और छोटे छोटे बच्चे तीन मे से एक नाँगर हल पकड़ता है और दो बच्चे जुवाड़ी पकड़ कर जुताई करते हैं।
नागर हल चलाते समय उनके ऊपर पानी डाल डाल कर जुताई करते हैं उसके बाद माटी झांँकर मिट्टी के ढेला को फसल सुरक्षा हेतु जंगल के जीव जन्तु के नाम लेकर फेंकता है। फेकते वक्त ढेला को लाठी डंडे मे मारते हैं इसका मतलब यह है कि इस वर्ष हमारी फसल को जंगल के जीव जन्तुओ से बचाना उसके बाद माटी झांँकर प्रति घर पीछे एक को धान बीज देता है।
धान बीज देते वक्त दोनों गालों मे मिटटी के चिखला को दिया जाता है तब सभी लोग झांँकर पुजारी बैगा सिरहा के पांव पड़ते हैं।
सभी लोग भोजन बना कर खाते हैं और माटी घर देव गुड़ी से झांँकर पुजारी को एक दो व्यक्ति खांद में बैठाकर उनके घर तक पहुँचाया जाता है ।इस प्रकार हमारे मूल निवासियों के द्वारा पारंपरिक तरीके से मिलकर जात्रा मनाते हैं। माटी जात्रा कार्यक्रम में विशेष रूप से माटी झाँकर छबिलाल नेताम,पुजारी रमेश नेताम, सुवारी गणेश नेताम समाज प्रमुख टीकम नागवंशी, फडीन्द्र ठाकुर, चमार यादव,नन्हे नेताम,बिसाहू यादव, दुबे नायक, सोधन नागेश,चैन सिंह नागवंशी, जय राम नागेश, सिरहा दुर्जन नेताम सहित क्षेत्र भर के सैकड़ो सगा समाज शामिल रहे।