
किशन सिन्हा, छुरा
छुरा। ग्रीष्म काल अब अपने उत्कर्ष पर पहुंचता जा रहा है जिसने गर्मी के अति दुर्गम दिन नौटप्पा को भी पार कर लिया है ऐसे में तापमान की स्थिति जिस प्रकार जलते दीपक में इंधन खत्म हो जाने से दीपक अपने आखिरी क्षणों में ज्यादा रौशनी दुगुने हलचल के साथ प्रदान करता है ठीक उसी प्रकार से जून के महीने में जब मानसून दस्तक देने ही वाला है तब गर्मी भी अपना रौद्र रूप दिखा रहा है हालत यह है कि गांव शहर चौक चौराहे कच्ची और पक्की सड़कें सुने सुने नजर आते हैं यही स्थिति वनांचल के छोटे बड़े वन्य क्षेत्रों की है जहां ऐसा प्रतीत होता है कि पशु पक्षी जंगली जानवर भी कहीं छुप गए हैं और जंगल भी प्राणियों से रहित (विहीन)नजर आता है, ऐसे में वन के छोटे बड़े पेड़ पौधे भीषण गर्मी की मार से झुलसे हुए नजर आ रहें हैं ऐसा लग रहा है कि अब इनमें मौसम की मार से लड़ने की क्षमता ना के बराबर होता जा रहा है।

इस बात की तस्दीक करती यह कुछ तस्वीरें हैं जिनमें हम भारत की सबसे इमारती व बेशकीमती आयुर्वेदिक औषधि के वृक्ष सागौन को देख सकते हैं जिसमें भीषण गर्मी व जल के कमी के कारण हरियाली कहीं गायब नजर आ रही हैं, आम तौर पर अंचल के इन वृक्षों को अलग से सिंचाई की आवश्यकता नहीं होती है वे स्वत: ही प्रकृति के माध्यम से अपने जीवन निर्वहन हेतु जल की पूर्ति कर लेते हैं लेकिन मौसम के इस बदलते प्रारूप से वनांचल की कई औषधीय गुणों से भरपूर इमारती वृक्ष व पेंड़ पौधे झुलसते नजर आ रहे हैं स्थिति में ना सिर्फ पेड़ पौधों को बल्कि संपूर्ण जीव जगत को अब अच्छी मानसून का इंतजार है जिससे सभी के जीवन की गाड़ी फिर से पटरी पर सुचारू रूप से दौड़ सके और इस भीषण गर्मी से राहत मिल सके।