टाइगर रिजर्व कोर एरिया से आदिवासियों को हटाने की खबर का खंडन, जल-जंगल-जमीन बचाओ संघर्ष समिति ने कहा – आदिवासी कब्जाधारी नहीं मूल मालिक हैं

Chhattisgarh Crimes Chhattisgarh Crimesपूरन मेश्राम/मैनपुर। दैनिक भास्कर में 31 अक्टूबर को प्रकाशित खबर टाइगर रिजर्व के कोर एरिया में जो बसे 15 दिन में उनकी सूची जारी कर कब्जा हटाएंगे और प्रेस में वनवासी शब्द के प्रयोग पर जल जंगल जमीन बचाओ संघर्ष समिति ने कड़ा ऐतराज जताया है। समिति के अध्यक्ष अधि सिरधन सोम एवं 128 ग्रामों की कार्यकारिणी ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर खबर का खंडन किया है।सिरधन सोम ने कहा कि हमारे 128 गांवों के आदिवासी 1000 सालों से इस जल-जंगल-जमीन पर रह रहे हैं। जल-जंगल-जमीन ही हमारी पहचान है। अपने ही घर में रहने वाले आदिवासी को कब्जाधारी’ कहना पूरे आदिवासी समाज का घोर अपमान है।

समिति ने 5 बिंदुओं पर आपत्ति दर्ज कराई है।बिना ग्राम सभा की सहमति के विस्थापन असंवैधानिक वन अधिकार अधिनियम 2006 की धारा 4(2) और PESA कानून 1996 के तहत बिना ग्राम सभा की स्वतंत्र सहमति के किसी भी आदिवासी को नहीं हटाया जा सकता। समिति ने दावा किया कि जुगाड़ के 203 में से सिर्फ 135 और देवझरअमली के 156 में से 120 परिवार ही स्वेच्छा से जाने को तैयार हैं। आज भी देवझरअमली के 36 और जुगाड़ के 68 परिवार, कुल 104 परिवार विस्थापन का पुरजोर विरोध कर रहे हैं। इनकी ग्राम सभा सहमति नहीं ली गई है।

15 दिन में कब्जा हटाना तानाशाही
विस्थापन का सिद्धांत स्वैच्छिक है,अनिवार्य नहीं। 15 दिन की समय-सीमा तय कर डराना-धमकाना बंद किया जाए। शासन की मंशा जंगल बचाने की नहीं, आदिवासियों को जड़ों से उजाड़ने की लग रही है।

पुनर्वास केवल कागजों पर सरकार पक्का मकान, बिजली, स्कूल,अस्पताल की बात कर रही है, लेकिन पहले विस्थापित गांव आज भी बिजली-पानी और पट्टे के लिए भटक रहे हैं।

वनवासी शब्द पर आपत्ति – समिति ने कहा कि संविधान में हमें अनुसूचित जनजाति यानी आदिवासी कहा गया है, वनवासी शब्द संविधान में कहीं नहीं है। ये शब्द हमें जंगल तक सीमित करने के लिए राजनीतिक रूप से बनाया गया है। जिला कलेक्टर गरियाबंद रणबीर शर्मा द्वारा वनवासी शब्द का प्रयोग कर राजनीति करना बंद किया जाए, यह संवैधानिक अधिकारों का हनन है।

अंत में समिति ने चेतावनी दी है कि अगर प्रशासन ने देवझरअमली के 36 और जुगाड़ के 68 परिवारों को जबरन हटाने की कोशिश की तो 128 ग्रामों के हजारों ग्रामीणों के साथ उग्र आंदोलन किया जाएगा, जिसकी पूरी जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की होगी।