
इंद्रेश महाराज ने यह भी कहा कि आज इंसानों को जाति, वर्ग और अलग-अलग पहचान के नाम पर बांटा जा रहा है। आने वाले समय में यही लड़ाई Gen-Z और Gen-Alpha के नाम पर भी हो सकती है। इन पहचान से पहले मानव बनना और इंसानियत को समझना जरूरी है।
पहले लोगों का विनाश बम और हथियारों से किया जाता था, लेकिन आज सोशल मीडिया के जरिए लोगों के मन और बुद्धि को प्रभावित किया जा रहा है। सोशल मीडिया पर राग-द्वेष, ईर्ष्या और नकारात्मकता बढ़ रही है। इसका असर सीधे लोगों की सोच और रिश्तों पर पड़ रहा है।
रिलेशनशिप में भरोसा और साफ सोच जरूरी
इंद्रेश महाराज ने रिलेशनशिप पर बात करते हुए कहा कि रिश्तों में भरोसा और साफ सोच जरूरी है। उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी का एक किस्सा सुनाया और रिलेशनशिप की अलग-अलग स्थितियों के बारे में बताया।
उन्होंने कहा कि एक स्थिति ऐसी होती है, जब दो लोग साथ रहते हैं, लेकिन शादी नहीं करते। दूसरी स्थिति में कोई व्यक्ति एक रिश्ते में रहते हुए किसी दूसरे व्यक्ति से भी उसी तरह बात करता है और दोनों को बराबर महत्व देता है।
उन्होंने तीसरी स्थिति बताते हुए कहा कि कई बार कोई व्यक्ति रिश्ते में होता है और दूसरा उसके रिश्ता टूटने का इंतजार करता रहता है। उसे उम्मीद होती है कि रिश्ता टूटने के बाद वह उसके पास आ जाएगा। ऐसी स्थिति को सही रिश्ता कहना ठीक नहीं है।
इंद्रेश महाराज ने कहा कि रिश्तों को खेल या विकल्प की तरह नहीं देखना चाहिए। रिश्तों में जिम्मेदारी और भावनाओं को समझना जरूरी है। आज कॉलेजों में भी कई युवाओं का ध्यान पढ़ाई से ज्यादा रिलेशनशिप पर जा रहा है। ऐसे में युवाओं को अपने भविष्य और जीवन के उद्देश्य पर भी ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि भारत में सोमवार, मंगलवार, एकादशी और प्रदोष जैसे कई व्रत रखे जाते हैं। लेकिन सबसे बड़ा व्रत पति-पत्नी का एक-दूसरे के प्रति ईमानदार रहना है। पति अपनी पत्नी के प्रति ईमानदार रहे और पत्नी भी अपने पति का साथ निभाए। जीवनभर एक-दूसरे के प्रति प्रेम, भरोसा और साथ बनाए रखना ही सच्चे रिश्ते की पहचान है।
जाति के बाद अब Gen-Z की लड़ाई न शुरू हो जाए
इंद्रेश महाराज ने कहा कि इंसानों को पहले ही जाति और दूसरी पहचानों के नाम पर बांटा जा चुका है। आज ब्राह्मणवाद, बनियावाद, क्षत्रिय और दलित जैसे नामों को लेकर बहस होती है। आने वाले समय में यह लड़ाई भी शुरू हो सकती है कि कौन Gen-Z है, कौन मिलेनियल है और कौन Gen-Alpha है।
उन्होंने कहा कि अलग-अलग पीढ़ियों को अपने समय के हिसाब से अलग सुविधाएं और परिस्थितियां मिली हैं। इसी वजह से उनकी सोच भी अलग बनी है। इसका मतलब यह नहीं है कि कोई बड़ा या छोटा है। सबसे पहले मानव बनिए और इंसानियत को समझिए।