बस्तर दशहरा की खास रस्म काछनगादी शनिवार देर शाम जगदलपुर के भंगाराम चौक स्थित काछनगुड़ी में पूरी होगी। इस दौरान पनका जाति की 12 साल की पीहू दास पर काछनदेवी सवार होंगी। देवी बेल के कांटों से बने खास झूले पर झूलकर बस्तर दशहरा मनाने की अनुमति देंगी। इसके बाद बस्तर दशहरा की दूसरी धार्मिक रस्में भी शुरू होंगी।
काछनगादी की रस्म निभाने वाली पीहू दास 5वीं कक्षा में पढ़ती हैं। उन्होंने इस रस्म से पहले करीब 9 दिनों तक देवी की पूजा की और उपवास रखा है। पीहू चौथी बार इस परंपरा में शामिल होंगी। इससे पहले पनका समाज की अनुराधा ने करीब 5 से 6 साल तक यह जिम्मेदारी निभाई थी।
बस्तर दशहरा में अलग-अलग जातियों और गांवों के लोगों को खास जिम्मेदारियां दी गई हैं। झारउमर और बेड़ाउमर गांव के ग्रामीणों को रथ बनाने की जिम्मेदारी मिली है। वहीं, काछनगादी की रस्म पनका समाज की कन्या निभाती है। यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है।
22 पीढ़ियों से एक परिवार बना रहा कांटों का झूला
काछनगादी की रस्म में इस्तेमाल होने वाला बेल के कांटों का खास झूला भी इस परंपरा का अहम हिस्सा है। लामनी के रहने वाले जगत राम नेताम का परिवार करीब 22 पीढ़ियों से झूला बनाने की जिम्मेदारी निभा रहा है।
परिवार के सदस्य जंगल से बेल की कांटेदार डालियां लाकर झूला तैयार करते हैं। यह काम धार्मिक आस्था और परंपरा के प्रति समर्पण के साथ किया जाता है। रस्म के दौरान परिवार के घर में नौ दिनों तक अखंड दीपक भी जलाया जाता है।
पीढ़ियां बदलने के बाद भी परिवार अपनी जिम्मेदारी निभाता आ रहा है। परिवार के सदस्यों ने इस परंपरा को आगे भी जारी रखने का संकल्प लिया है।
नवरात्र से एक दिन पहले होती है रस्म
बस्तर दशहरा की चौथी प्रमुख रस्म मानी जाने वाली काछनगादी हर साल नवरात्र से ठीक एक दिन पहले आयोजित की जाती है। इस अवसर पर बस्तर राजपरिवार के सदस्य और दशहरा समिति के पदाधिकारी काछनगुड़ी पहुंचकर देवी से उत्सव मनाने की अनुमति मांगते हैं।
अनुमति मिलने पर आतिशबाजी भी की जाती है। काछनदेवी को रण की देवी के रूप में भी जाना जाता है। पनका समाज की महिलाएं इस परंपरा से जुड़े धार्मिक आयोजनों में धनकुल वादन के साथ गीत गाती हैं।