जिन माता-पिता और परिजनों के साये में बच्चे खुद को सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं, उन्हीं के हाथों हिंसा का शिकार होना गंभीर चिंता का विषय है

Chhattisgarh Crimesजिन माता-पिता और परिजनों के साये में बच्चे खुद को सबसे सुरक्षित महसूस करते हैं, उन्हीं के हाथों हिंसा का शिकार होना गंभीर चिंता का विषय है।

मनोचिकित्सकों के मुताबिक गुस्से पर नियंत्रण की कमी, तनाव सहने की कमजोर क्षमता, पारिवारिक कलह और बच्चों को दंड देने के लिए मारपीट को सही मानने की सोच ऐसे व्यवहार का खतरा बढ़ा सकती है।

रायपुर में कोटा, तरुण नगर और राजेंद्र नगर की हालिया घटनाओं ने घर के भीतर बच्चों की सुरक्षा पर सवाल खड़े किए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि गुस्सा आना सामान्य है, लेकिन किसी बच्चे को गंभीर चोट पहुंचाना खतरनाक व्यवहार है। हालांकि, हर हिंसक व्यक्ति मानसिक रोगी नहीं होता। इसके लिए उसकी मानसिक स्थिति, पुराने व्यवहार और पारिवारिक परिस्थितियों का आकलन जरूरी है।

कुछ लोग विवाद के दौरान अपनी भावनाओं पर नियंत्रण खो देते हैं और समस्या सुलझाने के बजाय मारपीट का सहारा लेते हैं। वहीं, कुछ माता-पिता बच्चों को अपनी इच्छा के अनुसार चलाने के लिए शारीरिक दंड देना अपना अधिकार समझते हैं।

छोटे बच्चे पूरी तरह बड़ों पर निर्भर होते हैं। वे न तो खुद को बचा पाते हैं और न ही हमेशा अपनी तकलीफ बता सकते हैं। कई बार घरेलू विवाद का गुस्सा भी उन्हीं पर उतारा जाता है। हालांकि, किसी भी परिस्थिति में हिंसा को जायज नहीं ठहराया जा सकता।

अपनों द्वारा किए गए अपराध के तथ्य

  • देश में हर साल करीब 28-29 हजार हत्या की घटनाएं होती है।
  • छत्तीसगढ़ में हर साल करीब 900 से 1,000 हत्याएं होती है।
  • टोनही प्रताड़ना में भी परिचितों और रिश्तेदारों की भूमिका सामने आती है।
  • इसमें जमीन-जायदाद के बंटवारे में भाई, चाचा-भतीजे और अन्य रिश्तेदारों के बीच हिंसा होती है।