घने जंगलों के बीच पहाड़ी पर रहस्यमय पत्थर से निकलती है घंटे की आवाज, नवरात्र में देवी के मंदिर पर हर वर्ष उमड़ता है जनसैलाब

Chhattisgarh Crimes

किशन सिन्हा/ छत्तीसगढ़ क्राइम्स
छुरा. बिन्द्रानवागढ़ क्षेत्र के जिला मुख्यालय गरियाबंद से लगभग चालीस किलोमीटर दूर घने जंगलों में पहाड़ी के बीच स्थित है गरजई नामक स्थान है। जहां के रहस्मय पत्थर को ठोंकने पर उससे निकलती घंटे जैसी आवाज, बीहड़ जंगलों के बीच पहाड़ी की चोटी पर अनेकों शिलाओं के बीच उस विशेष पत्थर से किसी धातु से निकलने वाले स्वर का स्पष्ट सुनाई देना अद्भुत है और यह आवाज पिछले कई सालों से यहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सुनाई देती है। वहीं गुफाओं में दफन कई अनसुलझे रहस्य है जो अपने आप में कई कहानियों को समेटे हुए है ऐसे ही एक कहानी का वहां के ग्रामीणों से पता चलता है कि मंदिर में स्थित गुफा के भीतर एक गहरी और लम्बी सुरंग हैं। जहां का रास्ता पास के गांव मदनपुर के हिरातालब तक जाता है। जहां से गरजई मां प्रतिदिन स्नान करने अपने वाहन वनराज के साथ जाया करती थी हालांकि जन आस्था को सत्यता की पुष्टि हम नहीं कर सकतें लेकिन दैवीय शक्तियों की आस्था देखते ही बनती है।

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इसी मंदिर के गरजई नाम के पीछे कई एक कहानी बताई गई कि सात गांवों के बीच पहाड़ी के इस चोटी से किसी भी अप्रिय घटना से पूर्व यहां गड़गड़ाहट की आवाज़ सुनाई देती हैं मानों देवी स्वयं लोगों को सजग कर सतर्क रहने आगाह करती थी इसी कारण इस मंदिर को गरजाई माता मंदिर के नाम से जाना जाता है एक विशेषता यह है कि यहां होने वाले किसी भी कार्यक्रम का संचालन सात गांवों से बने समिति के द्वारा किया जाता है। साथ ही यहां की पुजा अर्चना शुरू से ही आदिवासी समुदाय के द्वारा ही किया जाता रहा है। यहां के स्थानीय ग्रामीणों की मान्यता के अनुसार सबसे पहले पहाड़ के ऊपर में पुजा अर्चना कर बलि देने की प्रथा थी लेकिन एक बार बलि देने के बाद पुजारी द्वारा बलि देने वाली हथियार को पहाड़ी में भूल वश छोड़ दिया गया और पहाड़ी के नीचे उतरते ही हथियार भूलजाने की बात याद आई और तुरंत ही वापस पहाड़ी पर गया तो देखा गया कि वहां देवियों की भीड़ थी और देखते ही पुजारी को पुछा गया कि आप यहां अभी क्यों वापस लौटे तो पुजारी ने कहा कि हथियार भूल गया था लेने आया हूं जिस पर क्रोधित होकर देवी ने हथियार पहाड़ से नीचे फेंकते हुए कहा कि ये हथियार जहां गिरेगा आज से वहीं पुजा करना ऊपर मत आना, जिसके चलते ग्रामीण पिछले कई सालों से नीचे में ही पुजा अर्चना करते थे। लेकिन पिछले लगभग अठारह साल पहले सिरकट्टी आश्रम के गुरूदेव संत श्री भूनेश्वरी शरण महराज ने पहुंच कर देवी का पुजा अराधना कर बलि प्रथा बंद कराकर श्वेत पुजा की शुरुआत की तब से ग्रामीण फिर से पहाड़ी के ऊपर पहुंच कर पुजा अर्चना की शुरुआत की।

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हालांकि पिछले लगभग अठारह वर्षों से कुंवार नवरात्र में यहां मेले व पर्व का आयोजन किया जाता है। किंतु बाकि दिनों में यहां लोग पुजा अर्चना कर एकांत में बैठकर अपने समय गुजारने परिवार के साथ आते हैं। हालांकि दिन में लोग यहां आते हैं और रात होने से पहले निकल जाते हैं। चुंकि आज यहां रात में जंगली जानवरों का खतरा बना रहता है जिसके चलते लोग शाम होते ही यहां से निकल जाते हैं।

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हालांकि सभी बातों का कोई पुख्ता प्रमाण तो नहीं मिलता, इसे आधी हकीकत कहें या फसाना फिर भी इस स्थान पर लोगों की आस्था और विश्वास आज भी देखने को मिलता है। आस्था और विज्ञान दोनों ही पहलू से यदि हम इस स्थान को देखें तो निश्चित तौर पर यह रोचक है आने वाले समय में यहां तक पहुंच मार्ग और सुलभ कर दिया जाय तो प्रकृति प्रेमियों के आगमन का एक अच्छा विकल्प है बस आवश्यकता पर्यटन के सुविधा उपलब्ध कराने की। और साथ ही आने वाले कंवार नवरात्र में गरियाबंद जिले में पर्यटन हेतु विशेष सम्भावना है।